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शनिवार, 20 मई 2017

भारतीय शास्त्रीय संगीत

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​घराना
घराना ( परिवार), हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की विशिष्ट शैली है, क्योंकि हिंदुस्तानी संगीत बहुत विशाल भौगोलिक क्षेत्र में विस्तृत है, कालांतर में इसमें अनेक भाषाई तथा शैलीगत बदलाव आए हैं।
इसके अलावा शास्त्रीय संगीत की गुरु-शिष्य परंपरा में प्रत्येक गुरु वा उस्ताद अपने हाव-भाव अपने शिष्यों की जमात को देता जाता है।
घराना किसी क्षेत्र विशेष का प्रतीक होने के अलावा, व्यक्तिगत आदतों की पहचान बन गया है, यह परंपरा ज़्यादातर संगीत शिक्षा के पारंपरिक तरीके तथा संचार सुविधाओं के अभाव के कारण फली-फूली, क्योंकि इन परिस्थितियों में शिष्यों की पहुँच संगीत की अन्य शैलियों तक बन नहीं पाती थी।
हिंदुस्तानी संगीत के प्रमुख घराने
1. ग्वालियर घराना
2. आगरा घराना
3. किराना घराना
4. बनारस घराना
5. जयपुर-अतरौली घराना
6. रामपुर-सहस्वान घराना
7. पटियाला घराना
8. दिल्ली घराना
9. भिंडी बाज़ार घराना
10. मेवाती घराना
1- ग्वालियर घराना-
ग्वालियर घराना हिंदुस्तानी संगीत का सबसे प्राचीन
घराना है। हस्सू खाँ, हद्दू खाँ के दादा उस्ताद नत्थन पीरबख्श को इस घराने का जन्मदाता कहा जाता है।
दिल्ली के राजा ने इनको अपने पास बुला लिया था। इनके दो पुत्र थे-कादिर बख्श और पीर बख्श। इनमें कादिर बख्श को ग्वालियर के महाराज दौलत राव जी ने अपने राज्य में नौकर रख लिया था। कादिर बख्श के तीन पुत्र थे जिनके नाम इस प्रकार हैं- हद्दू खाँ, हस्सू खाँ और नत्थू खाँ। ये तीनों भाई मशहूर ख्याल गाने वाले और ग्वालियर राज्य के दरबारी उस्ताद थे। इसी परम्परा के शिष्य बालकृष्ण बुआ इचलकरजीकर थे। इनके शिष्य पं. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर थे। पलुस्कर जी के प्रसिद्ध शिष्य ओंकारनाथ ठाकुर, विनायक राव पटवर्धन, नारायण राव व्यास तथा वीणा सहस्रबुद्धे हुए जिन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत का खूब प्रचार किया।
संस्थापक
हद्दू खाँ, हस्सू खाँ और नत्थू खाँ
विशेषतायें
1. खुली आवाज़ का गायन
2. ध्रुपद अंग का गायन
3. अलापों का निराला ढंग
4. सीधी सपाट तानों का प्रयोग
5. गमक का प्रयोग
6. बोल तानों का विशेष प्रयोग
प्रतिपादक
बालकृष्ण बुआ इचलकरजीकर
विष्णु दिगम्बर पलुस्कर
ओंकारनाथ ठाकुर
विनायक राव पटवर्धन
नारायण राव व्यास
वीणा सहस्रबुद्धे
2-आगरा घराना-
आगरा घराना हिंदुस्तानी संगीत के प्रसिद्ध घरानों में से एक है। आगरा घराने के जन्मदाता तानसेन के दामाद हाजी सुजान साहब थे। आगरा घराने में जिन्होंने पूरे देश में ख्याति प्राप्त की उनका नाम था उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ। फ़ैयाज़ खाँ की आवाज़ बहुत दमदार थी और ये महफिल में अपना अनोखा रंग जमा देते थे।
विशेषता
1. नोम-तोम में आलाप करना
2. खुली जोरदार आवाज़ में गाना
3. लय ताल पर विशेष जोर।
संस्थापक
हाजी सुजान खान और उस्ताद घग्घे खुदा बख्श
प्रतिपादक
फ़ैयाज़ खान
लताफ़त हुसैन खान
दिनकर काकिनी
3- किराना घराना
किराना घराना भारतीय शास्त्रीय संगीत और गायन की हिंदुस्तानी ख़याल गायकी की परंपरा को वहन करने वाले हिंदुस्तानी घरानों में से एक है। किराना घराने का नामकरण उत्तर प्रदेश के प्रबुद्ध नगर ज़िले के एक तहसील क़स्बा किराना से हुआ माना जाता है। यह उस्ताद अब्दुल करीम खाँ का जन्म स्थान भी है, जो बीसवीं सदी में किराना शैली के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भारतीय
संगीतज्ञ थे।
संस्थापक
अब्दुल करीम खाँ और अब्दुल वाहिद खान
प्रतिपादक
सवाई गंधर्व
सुरेशबाबू माने
प्रभा अत्रे
हीराबाई बादोडकर की शिष्या
माणिक वर्मा
सुरेशबाबू माने
4- बनारस घराना
बनारस घराना ( अंग्रेज़ी : Banaras Gharana )
हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के प्रसिद्ध घरानों में गिना जाता है। शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में इस घराने का बहुत ही महत्त्वपूर्ण योगदान है। उत्तर प्रदेश का बनारस घराना जयपुर घराने के समकालीन माना जाता है। इस घराने में गति व श्रंगारिकता के स्थान पर प्राचीन व प्रारंभिक शैली पर अधिक जोर दिया गया। बनारस घराने के नाम पर प्रख्यात नृत्यगुरु सितारा देवी के पश्चात् उनकी पुत्री कथक क्वीन जयंतीमाला ने इसके वैभव और छवि को बरकरार रखने का प्रयास किया है एवं गुरु-शिष्य परम्परा को आगे बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं।
शैली
यह घराना गायन और वादन दोनों कलाओं के लिए प्रसिद्ध रहा है। इस घराने के गायक ख़्याल गायकी के लिए जाने जाते हैं। इसके साथ ही बनारस घराने के तबला वादकों की भी अपनी एक स्वतंत्र शैली रही है। सारंगी वादकों के लिए भी यह घराना काफ़ी प्रसिद्ध रहा है। इस घराने की गायन एवं वादन शैली पर उत्तर भारत के लोक गायन का गहरा प्रभाव है। कुछ विद्वानों का कथन है कि आर्यों के भारत में स्थायी होने से पहले यहाँ की जनजातियों में संगीत विद्यमान था। उसका आभास बनारस के लोक संगीत में दिखता है। ठुमरी मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश की ही देन है। लखनऊ में इसकी पैदाइश हुई थी और बनारस में इसका विकास हुआ।
बनारसी ठुमरी
बनारसी ठुमरी के दो प्रकार हैं-
1. धनाक्षरी अर्थात शायरी ठुमरी – यह द्रुतलय में गाई जाती है और द्रुत तानों के द्वारा प्रसारित की जाती है।
2. बोल की ठुमरी – इसे मंद गति के साथ गाया जाता है और एक-एक शब्द को बोलते हैं।
बनारस अंग की ठुमरी में चैनदारी है। यहाँ की बोल-चाल और कहने का अलग क़िस्म का होता है। यहाँ की ठुमरी में ठहराव और अदायगी का अपना एक अलग रंग है। इसमें ख़ूबसूरती अपेक्षाकृत अधिक रहती है। ग्वालियर के राजा मानसिहं तोमर (तंवर) ठुमरी के आदि प्रवर्तक थे। उन्हीं के नाम पर इसका नाम ‘तनवरी’ पड़ा था, जो बाद में बिगड़कर ठुमरी हो गया। ठुमरी के इतिहास में मौजुद्दीन ख़ान, ग्वालियर के भैयासाहब गणपतराव और नवाब वाजिद अलीशाह का नाम भी महत्त्वपूर्ण है। बनारस की ठुमरी पंडित जगदीप मिश्र जी से शुरू हुई। पंडित जगदीप मिश्र, भैया गणपतराव एवं मौजुद्दीन ख़ान के समय से विलंबित लय की बोल बनाव ठुमरी के गाने का प्रचलन बढ़ा तथा बनारस में इसका अत्यधिक प्रचार-प्रसार हुआ, तत्पश्चात यही ठुमरी पूरब की बोलियाँ तथा लोकगीतों के प्रभाव से और अधिक भाव प्रधान हो गई, और अंत में ‘बनारसी ठुमरी’ के नाम से रूढ़ हो गई।
घराने की ख़्याल शैली
बनारस घराने का ख़्याल शैली में भी महत्त्वपूर्ण योगदान है। इस गायन पद्धति में शब्द का स्पष्ट उच्चारण किया जाता है। भावनाओं को स्वरों के माध्यम से सशक्त रूप से प्रकट किया जाता है। बनारस घराने के गायक ख़्याल गायन के लिए विशेष तौर पर पहचाने जाते हैं। ख़्याल का तात्पर्य है- ‘कल्पना’। इसका अभिव्यक्तिकरण विविधता से और सावधानी पूर्वक किया जाना चाहिए। ख़्याल गायन हज़ारों वर्षों की प्राचीन परंपरा है। यह प्राचीन परंपरा मुग़ल बादशाहों के दरबार में ध्रुपद पद्धति से गायी जाती थी। ख़्याल में हिन्दू और मुस्लिम कवियों की शृंगारिक या भक्ति रस में समर्पित रचनाओं का समावेश है। बनारस घराने के ख़्याल गायन में बनारस एवं गया की ठुमरी का समावेश है।
तबला प्रस्तुति
इस घराने की तबला वादक प्रस्तुति की अपनी एक स्वतंत्र पद्धति रही है। लगभग दो सौ वर्ष पूर्व पंडित रामसहाय मिश्र का जन्म 1780 में बनारस में हुआ था। बारह वर्ष की अल्प आयु में ही पंडित जी को अपने गुरु से तबले का सर्वोत्तम प्रशिक्षण प्राप्त हुआ था। वे जब मात्र केवल 21 वर्ष के थे, तभी उन्होंने नवाब वाजिदअली शाह के दरबार में सात दिन तक बिना रुके और पुनरावृत्ति न करते हुए तबला वादन किया था। उन्होंने अपनी कला का प्रदर्शन लोगों के सामने बंद कर अपना ध्यान तबला वादन की नयी पद्धति की खोज करने में केन्द्रित कर दिया था। इन्होंने तबले पर हाथ रखने की पद्धति और उँगलियों का प्रयोग नए ढंग से करके तबला वादन की नई पद्धति की खोज की, जिसका नाम बनारसी बाज़ पड़ा। इस पद्धति का उपयोग एकल वादन के साथ ध्रुपद गायन, जो पखावज के साथ गाया जाता है तथा ठुमरी , टप्पा और अनेक प्रकार के वाद्यों के साथ संगत में होने लगा।
प्रसिद्ध संगीतज्ञ
बनारस घराना गायन और वादन दोनों के लिए ही बहुत प्रसिद्ध रहा है। इस घराने के कुछ संगीतज्ञों के नाम इस प्रकार हैं-
1. शहनाई वादक – उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ान, पंडित रामसहाय मिश्र (जिन्होंने ‘बनारसी बाज़’ का शोध किया था)
2. तबला वादक – पंडित कंठे महाराज, पंडित अनोखे लाल,
पंडित किशन महाराज एवं पंडित गुदई महाराज आदि।
3. पखावज और मृदंग वादक – बनारस के पंडित मदन मोहन, पंडित भोलानाथ पाठक और पंडित अमरनाथ मिश्र आदि।
सुप्रसिद्ध सितार वादक पंडित रविशंकर का जन्म भी
बनारस में हुआ। श्रेष्ठ संतूर वादक पंडित शिवकुमार शर्मा के
पिता पंडित अमर दत्त शर्मा ने बनारस घराने के महान गायक पंडित बड़े रामदास जी से शिक्षा प्राप्त की थी। बनारस घराना सारंगी वादकों के लिए भी प्रसिद्ध रहा है, जिसमें प्रमुख है-
1. शम्भू सुमीर
2. गोपाल मिश्र
3. हनुमान प्रसाद मिश्र
4. नारायण विनायक
बनारसी ठुमरी एवं ख़्याल गायन यहाँ की विशिष्ट पद्धति है। ठुमरी गायिकाओं में रसूलन बाई, बड़ी मोती बाई, सिद्धेश्वरी देवी और गिरिजा देवी प्रमुख हैं। ख़्याल गायन में पंडित बड़े रामदास जी, पंडित छोटे रामदास जी, पंडित महादेव प्रसाद मिश्र, पंडित राजन-साजन मिश्र और उनके पुत्र एवं शिष्य इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे है।
5- जयपुर-अतरौली घराना
जयपुर-अतरौली घराना ( अंग्रेज़ी :
Jaipur-Atrauli Gharana )
हिंदुस्तानी संगीत के प्रसिद्ध
घरानों में से एक है। इसे ‘जयपुर घराना’ और ‘अल्लादिया ख़ान घराना’ नाम से भी जाना जाता है। उस्ताद अल्लादिया ख़ान इस घराने के संस्थापक कहे जाते हैं।
जयपुर घराने की शुरुआत करने वालों में भानु जी का नाम भी आता है, जिन्हें किसी संत द्वारा ताण्डव नृत्य की शिक्षा प्राप्त हुई। इनके बेटे मालु जी थे, जिन्होंने अपने पिता के सीखे हुए
नृत्य की शिक्षा अपने दोनों बेटों- लालू जी और कान्हू जी को दी। कान्हू जी ने
वृंदावन जा कर नटवरी नृत्य की शिक्षा भी प्राप्त की। इनके दो लड़के थे- गीधा जी और शेजा जी। पहले ने ताण्डव व दूसरे ने लास्य अंग में विशेष योग्यता प्राप्त की।
नृत्य शैली
जयपुर घराने से तात्पर्य कथक नृत्य की राजस्थानी परम्परा से है। इसके नर्तक ज़्यादातर हिन्दू राजाओं के दरबारों से संबद्ध रहे, अतः जहाँ एक ओर कथक नृत्य की बहुत-सी प्राचीन परम्परायें इस घराने में अभी भी सुरक्षित हैं, वहीं अपने आश्रायदाताओं की रुचि के अनुसार इनके नृत्य में जोश व तेज़ी तैयारी अधिक दिखाई पड़ती है। पखावज की मुश्किल तालों, जैसे- धमार, चौताल, रूद्र, अष्टमंगल, ब्रह्मा, लक्ष्मी, गणेश आदि ये अत्यंत सरलता से नाच लेते हैं। इनके द्वारा तत्कार में कठिन लयकारयों का प्रदर्शन बहुत प्रसिद्ध है। जितना पैरों की सफ़ाई पर इसमें ध्यान दिया जाता है, उतना हस्तकों पर नहीं। नृत्य के बोलों के अलावा,
कवित्त , प्रिमलू, पक्षी परन, जाती परन आदि के विभिन्न प्रकार के बोलों का प्रयोग इस घराने की विशेषता है। भाव प्रदर्शन में सात्विकता रहती है और ठुमरी की अपेक्षा भजन पदों पर भाव दिखाये जाते हैं।
विशेषता
1. गीत की बंदिश छोटी होना
2. खुली आवाज़ में गाना,
3. आवाज़ बनाने का निराला ढंग
4. वक्र तानें।
प्रतिपादक
मल्लिकार्जुन मंसूर
केसरभाई केरकर
किशोरी अमोनकर
श्रुति सदोलीकर
पद्म तलवलकर
अश्विनी भिडे
प्रमुख नर्तक
कथक की जन्मस्थली राजस्थान की इस धरा से जुड़े कथक के तीर्थ जयपुर घराने में नृत्य के दौरान पाँव की तैयारी, अंग संचालन व नृत्य की गति पर विशेष ध्यान दिया जाता है, इसीलिए सशक्त नृत्य के नाम पर जयपुर घराना शीर्ष स्थान कायम किए हुए है। नृत्याचार्य गिरधारी महाराज व शशि मोहन गोयल के अथक प्रयासों के दम पर यह घराना अपनी पूर्व छवि कायम किए हुए है। इनकी शिष्याओं ज्योति भारती गोस्वामी, कविता सक्सेना, निभा नारंग, रीमा गोयल, प्रीति सोनी, मधु सक्सेना और गीतांजलि आदि अनेक कलाकारों ने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जयपुर घराने का काफ़ी नाम किया है। जयपुर घराने को शीर्ष पर पहुँचाने में ‘ पद्मश्री ‘ से सम्मानित उमा शर्मा, प्रेरणा श्रीमाली, ‘पद्मश्री’ शोवना नारायण, राजेन्द्र गंगानी और जगदीश गंगानी के योगदान को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता है। इन कलाकारों ने विदेशों में भारतीय शास्त्रीय नृत्य की जो अमिट छाप छोड़ी है, वह अविस्मरणीय है।
6- रामपुर-सहस्वान घराना
रामपुर-सहस्वान घराना हिंदुस्तानी संगीत के प्रसिद्ध
घरानों में से एक है। रामपुर सहस्वान घराने की इस शैली में
स्वर की स्पष्टता पर एक तनाव है और विकास और राग का विस्तार एक चरण दर चरण प्रगति के माध्यम से किया जाता है।
संस्थापक
उस्ताद इनायत खान
प्रतिपादक
ग़ुलाम मुस्तफ़ा खान
उस्ताद निसार खान
उस्ताद राशिद खान
सुलोचना
बृहस्पति
7- पटियाला घराना
पटियाला घराना हिंदुस्तानी संगीत के प्रसिद्ध घरानों में से एक है। पटियाला घराने दिल्ली घराने की एक शाखा के रूप में माना जाता है।
संस्थापक
उस्ताद फ़तेह अली खान
उस्ताद अली बख्श
प्रतिपादक
बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ
अजॉय चक्रवर्ती
रज़ा अली खान
बेगम अख़्तर
निर्मला देनी
नैना देवी
परवीन सुल्ताना
8- दिल्ली घराना
दिल्ली घराना हिंदुस्तानी संगीत के प्रसिद्ध घरानों में से एक है। तानरस खान और शब्बू खान इस घराने के प्रवर्तक माने जाते हैं। तानरस खान की तान बहुत मशहूर थी। इन्होंने तानों का बहुत अभ्यास किया था। इनके पुत्र उमराव खाँ हुए जिन्होंने घराने को आगे चलाया।
संस्थापक
उस्ताद मम्मन खान
प्रतिपादक
चांद खान
नसीर अहमद खान
उसमान खान
इक़बाल अहमद खान
कृष्णा बिष्ट
9- भिंडी बाज़ार घराना
भिंडी बाज़ार घराना हिंदुस्तानी संगीत के प्रसिद्ध
घरानों में से एक है। भिंडी बाज़ार घराने की सबसे विशिष्ट विशेषता खयाल है, जो खुले आवाज़ की प्रस्तुति है। आवाज़ का उपयोग कर, सांस नियंत्रण और लंबे मार्ग की एक सांस में गायन पर एक तनाव है।
संस्थापक
उस्ताद छज्जू खान
प्रतिपादक
उस्ताद अमन अली खान
शशिकला कोरटकर
अंजनीबाई माल्पेकर
10- मेवाती घराना
मेवाती घराना हिंदुस्तानी संगीत के प्रसिद्ध घरानों में से एक है। यह अपनी शैली भाव प्रधान नोट्स के माध्यम से राग का मूड के विकास को महत्व देता है। यह पाठ के अर्थ को समान महत्व देता है।
संस्थापक
घग्गे नज़ीर खान
प्रतिपादक
पंडित जसराज
मोती राम
मणिराम
संजीव अभ्यंकर

संगीत घराना

घराना-
संगीत घराना भारतीय शास्त्रीय संगीत अथवा नृत्य की वह परंपरा है जो एक ही श्रेणी की कला को कुछ विशेषताओं के कारण दो याअनेक उप श्रेणियों में बाँटती है।
घराना (परिवार), हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की विशिष्टशैली है, क्योंकि हिंदुस्तानी संगीत बहुत विशाल भौगोलिक क्षेत्र में विस्तृत है, कालांतर में इसमें अनेक भाषाई तथा शैलीगत बदलाव आए हैं।
इसके अलावा शास्त्रीय संगीत की गुरु-शिष्य परंपरा में प्रत्येक गुरु वा उस्ताद अपने हाव-भाव अपने शिष्यों की जमात को देता जाता है।
घराना किसी क्षेत्र विशेष का प्रतीक होने के अलावा, व्यक्तिगत आदतों की पहचान बन गया है, यह परंपरा ज़्यादातर संगीत शिक्षा के पारंपरिक तरीकेतथा संचार सुविधाओं के अभाव के कारण फली-फूली, क्योंकि इनपरिस्थितियों में शिष्यों की पहुँच संगीत की अन्य शैलियों तक बन नहीं पाती थी।
हिंदुस्तानी संगीत के प्रमुख घराने:
*.ग्वालियर घराना
*.आगरा घराना
*.किराना घराना
*.बनारस घराना
*.जयपुर-अतरौली घराना
*.रामपुर-सहस्वान घराना
*.पटियाला घराना
*.दिल्ली घराना
*.भिंडी बाज़ार घराना
*.मेवाती घराना

संगीत का इतिहास

संगीत का इतिहास
युद्ध,उत्सवऔरप्रार्थनायाभजनके समय मानव गाने बजानेका उपयोग करता चला आया है। संसार में सभी जातियों मेंबाँसुरीइत्यादि फूँक के वाद्य (सुषिर), कुछ तार या ताँत के वाद्य (तत), कुछ चमड़े से मढ़े हुए वाद्य (अवनद्ध या आनद्ध), कुछ ठोंककर बजाने के वाद्य (घन) मिलते हैं।
भारत में संगीत की विकास यात्रामुख्य लेख :भारतीय संगीत का इतिहासप्रगैतिहासिक काल से ही भारत में संगीत की समृद्ध परम्परा रही है। गिने-चुने देशों में ही संगीत की इतनी पुरानी एवं इतनी समृद्ध परम्परा पायी जाती है। ऐसा जान पड़ता है किभारतमें भरत के समय तक गान को पहले केवलगीतकहते थे।
वाद्य में जहाँ गीत नहीं होता था, केवल दाड़ा, दिड़दिड़ जैसे शुष्क अक्षर होते थे, वहाँ उस निर्गीत या बहिर्गीत कहते थे और नृत्त अथवा नृत्य की एक अलग कला थी। किंतु धीरे धीरे गान, वाद्य और नृत्य तीनों का "संगीत" में अंतर्भाव हो गया -गीतं वाद्यं तथा नृत्यं त्रयं संगतमुच्यते

भारत से बाहर अन्य देशों में केवल गीत और वाद्य को संगीत में गिनते हैं; नृत्य को एक भिन्न कला मानते हैं। भारत में भी नृत्य को संगीत में केवल इसलिए गिन लिया गया कि उसके साथ बराबर गीत या वाद्य अथवा दोनों रहते हैं। हम ऊपरकह चुके हैं कि स्वर और लय की कला को संगीत कहते हैं।
स्वरऔर लय गीत और वाद्य दोनों में मिलते हैं, किंतु नृत्य में लय मात्र है, स्वर नहीं। हम संगीत के अंतर्गत केवल गीत और वाद्य की चर्चा करेंगे, क्योंकि संगीत केवल इसी अर्थ में अन्य देशों में भी व्यवहृत होता है।भारतीय संगीतमें यह माना गया है कि संगीत के आदि प्रेरक शिव और सरस्वती है। इसका तात्पर्य यही जान पड़ता है कि मानव इतनी उच्च कला को बिना किसी दैवी प्रेरणा के, केवल अपने बल पर, विकसित नहीं कर सकता।
भारतीय संगीत का आदि रूप वेदों में मिलता है।वेदके काल के विषय में विद्वानों में बहुत मतभेद है, किंतु उसका कालईसा से लगभग 2000 वर्ष पूर्व था - इसपर प्राय: सभी विद्वान् सहमत है। इसलिए भारतीय संगीत का इतिहास कम से कम 4000 वर्ष प्राचीन है।वेदोंमें वाण, वीणा और कर्करि इत्यादि तंतु वाद्यों का उल्लेख मिलता है। अवनद्ध वाद्यों में दुदुंभि, गर्गर इत्यादि का, घनवाद्यों में आघाट या आघाटि और सुषिर वाद्यों में बाकुर, नाडी, तूणव, शंख इत्यादि का उल्लेख है
।यजुर्वेदमें 30वें कांड के 19वें और 20वें मंत्र में कई वाद्य बजानेवालों का उल्लेख है जिससे प्रतीत होता है कि उस समय तक कई प्रकार के वाद्यवादन का व्यवसाय हो चला था।संसार भर में सबसे प्राचीन संगीतसामवेदमें मिलता है। उस समय "स्वर" को "यम" कहते थे। साम का संगीत से इतना घनिष्ठ संबंध था कि साम को स्वर का पर्याय समझने लग गए थे।छांदोग्योपनिषद्में यह बात प्रश्नोत्तर के रूप में स्पष्ट की गई है। "का साम्नो गतिरिति? स्वर इति होवाच" (छा. उ. 1। 8। 4)। (प्रश्न "साम की गति क्या है?" उत्तर"स्वर"। साम का "स्व" अपनापन "स्वर" है। "तस्य हैतस्य साम्नो य: स्वं वेद, भवति हास्य स्वं, तस्य स्वर एव स्वम्" (बृ. उ. 1। 3। 25) अर्थात् जो साम के स्वर को जानता है उसे"स्व" प्राप्त होता है। साम का "स्व" स्वर ही है।वैदिक काल से प्रारम्भ भारतीय संगीत की परम्परा निरन्तर फलती-फूलती और समृद्ध होती रही। इस पर सैकड़ों ग्रन्थ लिखे गये।अन्य देशों में संगीत का विकासभारत से बाहर सबसे प्राचीन संगीत सुमेरु, बवे डिग्री (बाबल याबैबिलोनिया), असुर (असीरिया) और सुर (सीरिया) कामाना जाता है। उनका कोई साहित्य नहीं मिलता। मंदिरों और राजमहलों पर उद्धृत कुछ वाद्यों से ही उनके संगीत का अनुमान किया जा सकता है। उनके एक वाद्य बलग्गु या बलगु काउल्लेख मिलता है। कुछ विद्वान् इसका अर्थ एक अवनद्ध वाद्य लगाते हैं और कुछ लोग धनुषाकार वीणा। एक तब्बलु वाद्य लगाते हैं और कुछ लोग धनुषाकार वीणा। एक तब्बलु वाद्य होता था जो आधुनिक डफ जैसा बना होता था। कुछ मंदिरों पर एक ऐसा उद्धृत तत वाद्य मिला है जिसमें पाँच से सात तार तक होते थे।
एक गिगिद नामक बाँसुरी भी थी। बैबिलोनिया की कुछ चक्रिकाओं में कुछ शब्दों के साथ अ, इ, उ इत्यादि स्वर लगे हुए मिलते हैं जिससे कुछ विद्वान् यह अनुमान लगाते हैं कि यह एक प्रकार की स्वरलिपि थी। जिस प्रकार से वेद का सस्वर पाठ होता था उसी प्रकार बैबिलोनिया में भी होता था और "अ" स्वरित का चिन्ह था, "ए" विकृत स्वर का, "इ" उदात्त का "उ" अनुदात्त का। किंतु इस कल्पना के पोषक प्रमाण अभी नहीं मिले हैं।चीनमे प्राय: पाँच स्वरों के ही गान मिलते हैं। सात स्वरों का उपयोग करनेवाले बहुत ही कम गान हैं। उनकी एक प्रकार की बहुत ही प्राचीन स्वरलिपि है।बौद्धोंके पहुंचने पर यहाँ के संगीत पर कुछ भारतीय संगीत का भी प्रभाव पड़ा।इब्रानीसंगीत भी बहुत ही प्राचीन है। यहाँ के संगीत पर सुमेरु - बैबिलोनिया इत्यादि के संगीत का प्रभाव पड़ा। वे लोग मंदिरों में जो गान करते थे उसे समय या साम कहते थे। इनका प्रसिद्ध तत वाद्य होता था जिसको ये "किन्नर" कहते थे।मिस्र देशका संगीत भी बहुत ही प्राचीन है। इन लोगों का विश्वास था कि मानव में संगीत देवी आइसिस अथवा देव थाथ द्वारा आया है। इनका प्रसिद्ध तत वाद्य बीन या बिण्त कहलाता था। मिस्र देश के लोग स्वर को हर्ब कहते थे। इनके मंदिर संगीत के केंद्र बन गए थे। अफलातून, जो मिश्र देश में अध्ययन के लिए गया था, कहता है, वहाँ के मंदिरों में संगीत के नियम ऐसी पूर्णता से बरते जाते थे कि कोई गायक वादक उनके विपरीत नहीं जा सकता था। कहा जाता है कि कोई 300 वर्ष ई.पू. मिस्र में लगभग 600 वादकों का एक वाद्यवृंद था जिसमें 300 तो केवल बीन बजानेवाले थे। इनके संगीत में कई प्रकार के तत, सुधिर, अवनद्ध और धन वाद्य थे।
मिस्र से पाइथागोरस और अफलातून दोनों ने संगीतसीखा। यूनान के संगीत पर मिस्र के संगीत का बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा।यूरोपमें सबसे पहलेयूनानमें संगीत एक व्यवस्थित कला के रूप में विकसित हुआ। भरत की मूर्छनाओं की तरह यहाँ भी कुछ "मोड" बने जिससे अनेक प्रकार की "धुने" बनती थी। यहाँ भी तत, सुषिर, अवनद्ध और धन वाद्य कई प्रकार के थे। यूरोप मेंपाइथागोरसपहला व्यक्ति हुआ है जिसनेगणितके नियमोंद्वारा स्वरों के स्थान को निर्धारित किया।लगभग 16वीं शती से यूरोप में संगीत का एक नई दिशा में विकास हुआ। इसे स्वरसंहति (हार्मनी) कहते हैं। संहति मेंकई स्वरों का मधुर मेल होता है, जैसे स, ग, प (षड्ज, गांधार, पंचम) की संगति। इस प्रकार के एक से अधिक स्वरों के गुच्छे को "संघात" (कार्ड) कहते हैं।
एक संघात के सब स्वर एक साथ भिन्न भिन्न वाद्यों से निकलकर एक में मिलकर एक मधुर कलात्मक वातावरण की सृष्टि करते हैं। इसी के आधार पर यूरोप केआरकेष्ट्रा(वृंदवादन) का विकास हुआ है।स्वरसंहति एक विशिष्ट लक्षण है जिससे पाश्चात्य संगीत पूर्वीय संगीत से भिन्न हो जाता है।

बुधवार, 17 मई 2017

भ्रूणहत्या : एक अभिषाप

एक बार इसे शांत चित्त से जरूर पढिए।
हर लडकी के लिए प्रेरक कहानी...
और लड़कों के लिए अनुकरणीय शिक्षा...,
कोई भी लडकी की सुदंरता उसके चेहरे से ज्यादा दिल की होती है।
...
...पति
ने घर मेँ पैर रखा....‘अरी सुनती हो !'
आवाज सुनते ही पत्नी हाथ मेँ पानी का गिलास लेकर बाहर आयी और बोली
"अपनी beti का रिश्ता आया है,
अच्छा भला इज्जतदार सुखी परिवार है,
लडके का नाम युवराज है ।
बैँक मे काम करता है।
बस beti  हाँ कह दे तो सगाई कर देते है."
Beti उनकी एकमात्र लडकी थी..
घर मेँ हमेशा आनंद का वातावरण रहता था ।
कभी कभार सिगरेट व पान मसाले के कारण उनकी पत्नी और beti के साथ कहा सुनी हो जाती लेकिन
वो मजाक मेँ निकाल देते ।
Beti खूब समझदार और संस्कारी थी ।
S.S.C पास करके टयुशन, सिलाई काम करके पिता की मदद करने की कोशिश करती ।
अब तो beti ग्रेज्यूऐट हो गई थी और नौकरी भी करती थी
लेकिन बाप उसकी पगार मेँ से एक रुपया भी नही लेते थे...
और रोज कहते ‘बेटी यह पगार तेरे पास रख तेरे भविष्य मेँ तेरे काम आयेगी ।'
दोनो घरो की सहमति से beti  और
युवराज की सगाई कर दी गई और शादी का मुहूर्त भी निकलवा दिया.
अब शादी के 15 दिन और बाकी थे.
बाप ने beti को पास मेँ बिठाया और कहा-
" बेटा तेरे ससुर से मेरी बात हुई...उन्होने कहा दहेज मेँ कुछ नही लेँगे, ना रुपये, ना गहने और ना ही कोई चीज ।
तो बेटा तेरे शादी के लिए मेँने कुछ रुपये जमा किए है।
यह दो लाख रुपये मैँ तुझे देता हूँ।.. तेरे भविष्य मेँ काम आयेगे, तू तेरे खाते मे जमा करवा देना.'
"OK PAPA" - beti ने छोटा सा जवाब देकर अपने रुम मेँ चली गई.
समय को जाते कहाँ देर लगती है ?
शुभ दिन बारात आंगन में आयी,
पंडितजी ने चंवरी मेँ विवाह विधि शुरु की।
फेरे फिरने का समय आया....
कोयल जैसे कुहुकी हो ऐसे beti दो शब्दो मेँ बोली
"रुको पडिण्त जी ।
मुझे आप सब की उपस्तिथि मेँ मेरे पापा के साथ बात करनी है,"
“पापा आप ने मुझे लाड प्यार से बडा किया, पढाया, लिखाया खूब प्रेम दिया इसका कर्ज तो चुका सकती नही...
लेकिन युवराज और मेरे ससुर जी की सहमति से आपने दिया दो लाख रुपये का चेक मैँ वापस देती हूँ।
इन रुपयों से मेरी शादी के लिए लिये हुए उधार वापस दे देना
और दूसरा चेक तीन लाख जो मेने अपनी पगार मेँ से बचत की है...
जब आप रिटायर होगेँ तब आपके काम आयेगेँ,
मैँ नही चाहती कि आप को बुढापे मेँ आपको किसी के आगे हाथ फैलाना पडे !
अगर मैँ आपका लडका होता तब भी इतना तो करता ना ? !!! "
वहाँ पर सभी की नजर beti  पर थी...
“पापा अब मैं आपसे जो दहेज मेँ मांगू वो दोगे ?"
बाप- भारी आवाज मेँ -"हां बेटा", इतना ही बोल सके ।
"तो पापा मुझे वचन दो"
आज के बाद सिगरेट के हाथ नही लगाओगे....
तबांकु, पान-मसाले का व्यसन आज से छोड दोगे।
सब की मौजुदगी मेँ दहेज मेँ बस इतना ही मांगती हूँ ।."
लडकी का बाप मना कैसे करता ?
शादी मे लडकी की विदाई समय कन्या पक्ष को रोते देखा होगा लेकिन
आज तो बारातियो कि आँखो मेँ आँसुओ कि धारा निकल चुकी थी।
मैँ दूर se us beti को लक्ष्मी रुप मे देख रहा था....
रुपये का लिफाफा मैं अपनी जेब से नही निकाल पा रहा था....
साक्षात लक्ष्मी को मैं कैसे लक्ष्मी दूं ??
लेकिन एक सवाल मेरे मन मेँ जरुर उठा,
“भ्रूण हत्या करने वाले लोगो को is जैसी लक्ष्मी मिलेगी क्या" ???
कृपया रोईए नही, आंसू पोछिए और प्रेरणा लीजिये।
Aur whatsapp per zabardast share kijiye
या मत कीजये ये आपकी मर्जी
Please save girls....
आपको किसी कि कसम नहीं  है
अगर ये मसज फॉरवर्ड नही किआ तो कोई बात नहीं
लेकिन पूरा पढ़ने के  लिए आपका हार्दिक आभारी हूं ।

बहुत ही मार्मिक क्षण : जब चिड़िया हो गयी मूर्छित

बहुत ही मार्मिक व भावुक क्षण
आज जब मैं दोपहर को 1 बजे के करीब मेरे स्टुडेन्ट (होम ट्यूशन) दिव्यांश को ट्यूशन करा रहा था तभी रूम के दरवाजे पर कुछ धड़ाम से गिरने की आवाज़ आयी। बाहर झांकने पर एक #चिड़िया #अधमरी सी आंगन में #तडपती हुई दिखी।
(शायद भयंकर धूप में प्यास के कारण चक्कर खाकर मूर्च्छित होकर गिर पड़ी)
मैंने तुरंत मेरे स्टूडेंट से पानी लाकर उस चिड़िया पर हल्के से छिड़काव करने को कहा जब दो कप पानी चिड़िया को छिड़काव किया तब जाके बिचारी कुछ हौस में आयी । बाद में उसको मैंने कप से ही पानी पिलाया लगभग आधा कप पानी पीने के बाद चिड़िया पुनः स्वच्छंद होकर उड़ गयी।
यह 5 मिनट की मार्मिक दृश्य को देखकर मन करूणामय हो गया एक तरफ मूर्छित चिड़िया को देख बहुत दु:ख हुआ और दूसरी तरफ जब पानी मिलने के बाद जो वो पुनः खुले आसमान में ऊड़ी तो बहुत प्रसन्नता महसूस हूई।
भगवान का धन्यवाद है कि बिचारी चिड़िया हमारे पास आ गिरी और समय पर उसे मदद मिल गई। अगर कहीं और गिरती जहाँ कोई मदद नहीं मिलती तो शायद ही जिन्दा बच पाती।
इसलिए आप सभी से मैं हाथ जोडकर विनम्रता पूर्वक निवेदन करता हूँ कि अपने घर/दुकान/ओफिस व आसपास जहां पक्षी विचरण करते दिखे उन जगहों पर पक्षियों के लिये दाने-पानी (परींडो) की व्यवस्था जरूर करें और दूसरों को भी इसके लिये प्रेरित करें।
मुझे विश्वास है कि आप जरूर करेंगे। धन्यवाद
जीवमात्र के प्रति हमेशा दयाभाव रखें। इससे बढ़कर कुछ नहीं।
( जब वह चिड़िया कप से पानी पीते समय करूणामय नजरों से मेरी तरफ देख रही थी वह क्षण मेरे दिल को छू गया ।)

सोमवार, 1 मई 2017

संपादकीय : आरक्षण सही मायने में पिछडों के हक में या खिलाफ

संपादकीय........✍🏻✍🏻✍🏻✍🏻✍🏻

आरक्षण के लोभियों के लिये यह जोर का तमाचा है जो लोग साधन सम्पन्न होने के बावज़ूद अपनी जाति के द्वारा पिछड़े होने का नाजायज फायदा उठा रहे हैं और अपने वर्ग ही नहीं अन्य वर्गों के भी गरीब व पिछड़े लोगों का हक छीनकर संविधान निर्माताओं को भी लज्जित कर रहे हैं कि उन्होंने पिछडों के लिये कोई अस्थायी व्यवस्था बनाई और आरक्षण वादियों ने इसे अपना ही एकाधिकार समझकर स्थायी कर दिया जिससे कुछ पिछड़े मजबूत होकर अपनी पीढ़ियों को मजबूत करने में लगे हैं और वास्तविकता में जो पिछडे हैं और गरीब हैं उन्हें कोई फायदा नहीं मिल रहा चाहे वे किसी भी जाति के हो।
आरक्षण आर्थिक आधार पर हो न कि जाति के आधार पर ।
या फिर न ही हो तो ही ठीक है। समानता का अधिकार..........

Plz is sms ko ache se samjhe

स्कूल से
एक 6'th क्लास का बच्चा
अपने घर आकर
अपनी माँ से पूछता है :- "माँ ये SC और ST क्या हैं ?"

माँ :- बेटा,
ये तुम्हे क्यों जानना है ?

बच्चा :- माँ आज सर हमसे पूछ रहे थे
की कौन-कौन SC ST का हैं

माँ :- बेटा उन्होंने ऐसा क्यों पूछा,
उन्होंने नहीं बताया क्या ?

बच्चा :- बताया पर सिर्फ इतना कि,
जो जो SC ST के हैं
उन्हें पैसे मिलेंगे,
पर माँ ये क्या होता हैं?

माँ :- बेटा
हमारे सविधान में
4 कास्ट बनायीं है --
SC, ST, Obc और General
तो सरकार उन्हें गरीब और पिछड़े हुए लोगो को मदद करने के लिए सुविधा दी हैं।

बच्चा -: पर माँ
सिर्फ उन्हें ही क्यों मिलती हैं और
मेरा दोस्त तो गरीब भी नहीं हैं फिर
भी उसे मिलेगे पैसे,
ये सुविधा गरीब के लिए हैं तो
हम भी गरीब है न तो
हमको क्यों नहीं मिलेंगे पैसे?

माँ :- बेटा ये सविधान में लिखा है।

बेटा :- पर माँ सविधान के बारे में कहा था की
सबको एक जैसा हक़ है तो फिर ये क्यों ?

माँ :- बेटा
ये सब राजनीति का गन्दा खेल हैं
उनकी वजह से आज
धर्म और जाति के नाम पर लोग एक सामान नही हैं

बेटा :- पर माँ हम क्या हैं,..? जिससे हम को पैसे नहीं मिलेगे

माँ :- बदनसीब,
हम लोग बदनसीब है बेटा
पूरे विश्व में कही पर
इस तरह का नियम नहीं है
बस हमारे भारत में है
ये सुविधा, सविधान निर्माता ने इसको सिर्फ 10 वर्ष के लिए रखा था
पर ये देश के दलालो ने इसको पूर्ण रूप से लागू कर दिया.

बेटा :- माँ क्या आगे भी
मुझे इसी तरह की दिक्कत होगी ?

माँ :- हाँ बेटा,
आगे तुझे पढ़ाई में,
नोकरी में, प्रमोशन में,
हर जगह दिक्कत आएगी,
जातिवाद का जहर तुझे मजबूर कर देगा और
तू कितना भी सहन करले,
एक दिन तू जरूर बोलेगा की ये कोटा बंद करो

बेटा :- माँ तो क्या हमारी मदद कोई नहीं करेगा,..?
काश में भारत छोड़ कही और पैदा हुआ होता

माँ :- ऐसा नहीं बोलते बेटा
इस धरती को
हमारे पूर्वजो ने खून से सींचा हैं और
बलिदान दिया है
तुम्हे गर्व होना चाहिए की तुम एक भारतीय हो,
बस ये सत्ता के भूखे लोग हमारी गरीबी दूर करने के बजाये वोट पाने की होड़ में हैं ।

बेटा :- माँ मेरा दोस्त बोलता हैं की पैसे मिलेगे तो पार्टी करेगे,
माँ हमें एक रोज की रोटी
बड़ी मुश्किल से मिलती हैं और
मेरे दोस्त पार्टी करेगे,
माँ में नहीं जाउगा स्कूल कल से ।

माँ :- नहीं बेटा,
तुम रोज स्कूल जाओ और पढ़ो,
पढ़लिख कर शायद तुम इस कोटा को बदल दो

बेटा :- हा माँ में खूब पढूंगा पर
हमारे पास इतने पैसे नहीं हैं की आगे पढ़ सकूँ

माँ :- तू चिंता न कर, मैं काम करुँगी न तेरी पढ़ाई के लिए

ये सन्देश
हमारे राजनेताओ तक पहुचे और वो
सिर्फ गरीबो को कोटा दे न कि विकसित लोगो को..

आपकी पहल
शायद किसी प्रतिभाशाली व्यक्ति का
जीवन सुधार दे.....

अगर 40% नंबर पाने वाला
पुलिस अधिकारी बन जाता है और
80% नंबर पाने वाला
रोजगार न मिलने के कारण चोर बन जाता है,
तब आप सोचिये,
क्या वो S.P साहब कभी उस चोर को पकड़ पायेगे जो
उनसे जायदा दिमाग रखता है|

आरक्षण हटाओ,
देश बचाओ...

Sahmat hain to...
Plz... share..it
.👍