पेज

शनिवार, 22 सितंबर 2018

गंदे पापा .... प्रेरक प्रसंग

गंदे पापा ....

मिडिल क्लास फॅमिली में पली बढ़ी खुशबू अपने जिंदगी में सबसे ज्यादा गुस्सा अपने पापा से थी। पापा के लिए उसके मन में नफरत के अलावा कुछ न था।

22 साल की हो चुकी खुशबू ने आज तक एक भी वेलेंटाइन नहीं बनाया था...जबकि उसकी क्लास मेट्स.... हर साल अलग अलग बॉयज के साथ वेलेंटाइन डे मनाती थी ...

खैर, आज खुशबू आग्नेय से शादी के वक़्त सबसे ज्यादा खुश थी... कि आखिर इस बेहद स्ट्रिक्ट, कड़क और डिसिप्लिनड पापा से छुटकारा तो मिला।"ये न करो" "वो न करो" ऐसे कपड़े न पहनों",लेट नाईट पार्टियाँ नहीं,"लड़कों से दोस्ती नहीं।"

आज तक एक स्मार्टफोन खरीद तक नहीं दिया...!... सारे सपनों और अरमानों को अपने नैरो माइंडेड सोच के कारण कुचलकर रख दिया ।अब मैं आग्नेय के साथ सारी दबी इच्छाएँ पूरी करूँगी।....आग्नेय और खुशबू पिछले तीन सालों से एक ही कॉलेज में साथ साथ पढ़ते थे और एक दूसरे को अच्छी तरह जानते थे एक दूसरे की पसंद नापसंद का अच्छे से ख्याल रखते थे। खुशबू ने बहुत डरते डरते पापा से आग्नेय के साथ शादी की इच्छा जताई थी।और पापा ने आग्नेय और उसके परिवार वालों से मिलकर शादी के लिए हामी भर दी।

*

खुशबू ने विदाई समय पहली बार पापा को उससे लिपटकर बच्चों की तरह फूट फूट कर रोते देखा पर खुशबू को पापा के इमोशन से कोई मतलब न था वह बस पत्थर की बुत बन खड़ी थी,जाते जाते पापा ने ढ़ेर सारे गिफ्ट के साथ एक बंद लिफाफा भी खुशबू को दिया।

ससुराल पहुँचते ही सबसे पहले खुशबू ने लिफाफा खोल पापा की चिट्ठी को पढ़ना शुरु किया " खुशबू बेटा मैं जानता हूँ कि पिछले दस सालों से मैं तुम्हारे साथ बैड डैड की तरह पेश आता रहा।मैं तुम्हारे सामने स्ट्रिक्ट इसलिए बनता था क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि तुम्हारा भी हाल रागिनी जैसा हो ।रागिनी मेरे साथ कॉलेज में पढ़ने वाली एक बहुत अच्छे घर की पढ़ने में तेज शरीफ लड़की थी परंतु फैशन और नकली ग्लैमर के चक्कर में उसने अपनी ज़िंदगी बर्बाद कर ली थी।

"उसने वो सब किया जिससे मैं तुम्हें हमेशा रोकता रहा।फैशनेबल कपड़े ,लड़को से दोस्ती,लेट नाईट पार्टियाँ सब करती थी ,सोचती चरित्र अच्छा है तो इन सब में कोई हर्ज नहीं।फिर एक दिन उसके ड्रिंक्स में नशा डालकर उसके कुछ दोस्तों ने .........।इस घटना से वो अपना दिमागी संतुलन खो बैठी और समाज के तानों और लोगों से बचने के लिए उसके पापा ने उसकी माँ और छोटी बहन के साथ सल्फास खाकर सुसाइड कर लिया।"

खुशबू बेटा, आज से तुम अब दो परिवारों की इज़्ज़त हो और मैं तुमसे यही उम्मीद करूँगा कि तुम ऐसा कोई काम नही करोगी जिससे दोनों परिवारों की इज़्ज़त पे कोई दाग लगे और हो सके तो अपने बैड डैड को माफ कर देना।

चिट्ठी पढ़कर खुशबू फूट फूट कर रोते हुए तुरंत फ़ोन लगाकर भर्राए आवाज़ में पापा से कहा" मुझे माफ़ कर दीजिए पापा ! मैं आपके गुस्से के पीछे के प्यार को नही देख पाई!!! आपके चिल्लाहट के पीछे की केअर नहीं देख पाई!आपकी झुंझलाहट के पीछे का समर्पण नही देख पाई !"

" मैं हर जन्म में आपकी ही बेटी बनना चाहूँगी पापा ......."

वक़्त बीतता गया ....

खुशबू को ससुराल आए लगभग एक साल होने को आया...मगर ऐसा कोई दिन ना था जिस दिन उसने अपने पापा को याद ना किया हो।आज उसके पापा का जन्मदिन था।सुबह मंदिर गई ।पूजा की ...पापा की खुशी और सलामती के लिए दुआएँ माँगी।फिर शाम में केक लाकर अपने ससुरालवालों के साथ उनका जन्मदिन मनाने का प्रोग्राम बनाया।

फिर केक काटने से पहले पापा को वीडियो कॉल लगाया उधर पापा मम्मी के साथ उदास बैठे थे।खुशबू उन्हें देखते ही चहक के बोली " हैप्पी बर्थडे टू यू माई स्वीट पापा !!!! पता है पापा ...... यहाँ मैं आपकी डाँट... आपके गुस्से... को हर दिन मिस करती हूँ ।यहाँ सारे लोग मुझे बहुत प्यार करते हैं स्पेशली सासू माँ!पता है पापा .....एक दिन घर में मुहल्ले की औरतों सासु माँ को जब ये बोल रहीँ थीं कि कितनी अच्छी बहु मिली है तुम्हे ।....कपड़ो ,बोली और स्वभाव में शालीनता जरूर इसके मम्मी पापा से विरासत में मिले है।....आज कल की लड़कियों में इतने संस्कार अब कहाँ मिलते हैं।आपके लिए ये शब्द सुनकर पापा मेरा सर फक्र से ऊँचा हो गया।"

" आज मुझे आपपे प्राउड है पापा । आप मम्मा को हमेशा बोलते थे कि" सारी दुनिया को तो सुधार नही सकते बस अपना दामन बचा के रखना होगा।"

जानती हूँ पापा और महसूस भी किया है मैंने कि...आजकल लड़कियों के लिए बॉयफ्रेंड बनाना ,ड्रिंक्स करना, लिव इन रिलेशन रहना और ट्रांसपेरेंट ड्रेस पहनना फैशन सा है पर आपने एक सुरक्षा कवच बनकर मुझे इन बुराइयों से बचाये रखा।

आपको पता है पापा जब मैं यहाँ बी.एड. का एग्जाम पास कर टीचर बनूँगी ना....तो बच्चो को यही सिखाऊंगी कि "डैड के तेज गुस्से के पीछे का प्यार महसूस कर सको तो कर लो, ऐसा न हो कि बाद में सिर्फ पछताने के सिवा कुछ न रहे!!!"

दूसरी तरफ पापा के होंठ काँप रहे थे .. वो बोल रहे थे आँखों से लगातार आँसू लिए मुँह से अपनी खुशबू बेटी के लिए " खुश रहो भगवान करे तुम्हें मेरी उम्र और खुशियाँ लग जाए बेटा "

बुधवार, 19 सितंबर 2018

रेखा आचार्य अपने गांव की पहली लड़की जिसका चयन सरकारी सेवा में हुआ......

मंजिल तो तुम जीत चुकी बस ऐलान बाकी था अब वो भी हो गया ।

बहना तेरे संघर्ष को सलाम
रेखा आचार्य के संघर्ष की कहानी सब के लिए मिसाल बन गई है बीकानेर जिले की लुणकरनसर तहसील का एक छोटा सा गांव  मिठडियाँ आज  वैसे तो सरकारी नौकरी के क्षेत्र अन्य गांवों की उपेक्षा बहुत आगे है । लेकिन आज तक गांव की किसी लड़की का सरकारी नौकरी में चयन नहीं हैं लेकिन अब इतिहास को बदल दिया है गांव की बेटी रेखा आचार्य ने ।
रेखा के संघर्ष की कहानी बहुत ही प्रेरणादायक  है भले ही अंतिम परिणाम बाकी हो लेकिन गांव की इस बिटिया ने जो जीत हासिल कर ली है अपने हौसले और संघर्ष से अब तो सिर्फ वह तारीख बाकी है जब इतिहास लिखा जाएगा । 
रेखा का  संघर्ष तूफान के विपरीत दौड़ लगाने के बराबर था 
रेखा के पिता एक रिक्शा चालक है जो कि  रिक्शा चलाकर अपने बच्चों की पढ़ाई खर्च और अपना घर चलाता है लेकिन उसने अपनी गरीबी का अनुभव कभी भी अपने बच्चों को होने नहीं दिया और रेखा को हमेशा पढ़ाई के लिए आगे भेजते रहें ।
रेखा ने भी अपने पिता के विश्वास को कायम रखा और हमेशा पढ़ाई के लिए संघर्षशील रही । पढ़ने के लिए गांव से बाहर भी जाना पड़ा तो रेखा ने दिन-रात नहीं देखा मेहनत के बलबूते पर राजस्थान पुलिस का पेपर पास किया तो मानो पूरे परिवार एवं गांव को गर्व महसूस करवा दिया लेकिन उनके संघर्ष का तो अभी असली इम्तिहान शुरू ही हुआ था । क्योंकि पेपर के बाद फिजिकल पास करना लड़कियों के लिए एक बड़ी चुनौती होता है लेकिन गांव की इस बेटियां ने इस चुनौती  को दोनों हाथों से स्वीकार कर लिया ।
मानो गांव का इतिहास बदलने के लिए उसने ठान लिया था कि
 सरकारी नौकरी के क्षेत्र में आज तक किसी भी लड़की का नाम नहीं था इसलिये मैं  इस गांव का नाम रोशन करूंगी।
 लेकिन सवाल उठता था रेखा की फिजिकल तैयारी का क्योंकि एक छोटे से गांव में फिजिकल तैयारी करना मुश्किल था लेकिन इस कठिन  समय  में साथ दिया रेखा के  दोनो छोटे भाइयों ने सूरज छिपने के बाद और सूरज उगने से पहले इन 12 घंटों में खूब मेहनत की रेखा ने मैदान में लड़ती रही वह हर चुनोती, हर  जंग  से
 और करती रही दौड़ की तैयारी ।

 20 दिन के मिलेे इस समय मे खूब मेहनत की  गांव की इस बिटिया ने  रोजाना 10km. दौड़ करना , ओर उसके बाद पूरे दिन खेत मे मां का साथ देती थी  ।
 रेखा के लिए दौड़ करना भी किसी चुनौती से कम नहीं था क्योंकि दिन के समय गांव में दौड़ करना आसान नहीं था क्योंकि लोगो के हजारों सवालो का जवाब उसके पास नही था । सूरज छिपने के बाद दौड़ की तैयारी करती थी रेखा ।
 इस समय में उसके छोटे भाइयों ने भरपूर साथ दिया हर समय ट्रैक पर दौड़ करवाने के लिए  अगर भागना भी पड़ा तो  साथ भी भागे ।
लेकिन भगवान को तो जैसे रेखा के सामने  मुश्किल खड़ी करना थी। फाइनल दौड़ से 3 दिन पहले दौड़ की तैयारी करते समय रेखा के एक पैर में मोच पड़ गई और रेखा को दौड़ करने में बहुत मुश्किल होने लग गई ।
लेकिन संघर्ष की एक नई कहानी लिखने की चुनौती के सामने रेखा ने हार नहीं मानी और एक बडे दर्द के बावजूद दौड़ने के लिए बीकानेर शारीरिक पुलिस परीक्षा में शामिल हो गईं ।
भाग्य से रेखा की संघर्ष की कहानी को देखने का सौभाग्य  मुझे भी मिल गया डॉक्टर करणी सिंह स्टेडियम में रेखा के साथ मेरा भी शारीरिक दक्षता परीक्षण होना था सुबह के 4:00 बजे हम दोनों ने स्टेडियम में प्रवेश किया लेकिन इतिहास बदलना अभी बाकी था दुर्भाग्य से मुझे height में बाहर कर दिया गया लेकिन रेखा दौड़ के लिए क्वालीफाई हो गई ।
पहले ही बेंच में  दौड़ के लिए 200 लड़कों के साथ 20 लड़कियों में रेखा को भी शामिल कर लिया गया । मुश्किल ने हर मोड़ पर गांव की इस बिटिया को रोकने का प्रयास किया जब लड़को के साथ  लड़कियों को भगा दिया गया  ।  जैसे हीे दौड़ के लिए सायरन बजा रेखा ने पैर में दर्द के बावजूद दौड़ में कोई कमी नही छोड़ी 
रेखा के संघर्ष ओर मेहनत के आगे बड़ी से बड़ी मुश्किल की भी एक ना चली । दौड़ते  समय रेखा के साथ दौड़ रही लड़किया अचेत होकर गिर भी रही थी लेकिन रेखा ने अपना हौसला कायम रखा  रेखा की दौड़ के समय मेरे मुंह से एक ही आवाज निकल रही थी कि भाग बहिन भाग अगर आज जंग जीत गई तो गांव के लिए मिसाल बन जाएगी । और 5km. की दौड़ रेखा ने निर्धारित समय से 2 मिनट पहले ही पूरी कर दी । ओर रेखा ने अपने परिवार और पूरे गांव का नाम गर्व से ऊंचा कर दिया । उस पिता की आँखे उस समय पानी से भर गई जब अपनी बेटी के संघर्ष को वो मैदान के बाहर से देख रहे थे । पूरे गाँव में खुशी की लहर फेल चूकी थी इस समय बहिन के संघर्ष के आगे कही न कही मेरी असफलता दब चुकी थी । बीकानेर पुलिस शारीरक दक्षता में  सफल 25 लड़कियों  में रेखा का नाम भी सुमार कर लिया गया पूरे गाँव का इतिहास अब बदल चुका था आज तक गाँव के लड़कों ओर गाँव की बहूओ ने तो खूब नाम कमा रखा था हर विभाग में लेकिन अबकी बार गाँव की बिटिया ने इतिहास के पन्नो पर अपना नाम लिखा था । गाँव की बेटी की इस सघर्ष को अपने आंखों से देखने के बाद में अपने आप को रोक ना सका मेने अपने शब्दों को एक कोरे कागज में बहना तेरे संघर्ष को सलाम नामक शीर्षक से लिख दिया । और मेरी असफलता को इस बहिन की सफ़लता से जोड़ दिया । 

✍✍
From  - कृष्ण लाल कस्वां

पर्यावरण संरक्षण के लिए अपना शरीर बलिदान कर दिया

#खेजड़ली_बलिदान_दिवस 
के अवसर पर 363 वीर-शहीदों को शत्-शत् नमन 


आज सारी दुनिया में पर्यावरण संरक्षण की चिंता में पर्यावरण चेतना के लिये सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर विभिन्न कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। भारतीय जनमानस में पर्यावरण संरक्षण की चेतना और पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों की परम्परा सदियों पुरानी है। हमारे धर्मग्रंथ, हमारी सामाजिक कथायें और हमारी जातीय परम्परायें हमें प्रकृति से जोड़ती है। प्रकृति संरक्षण हमारी जीवन शैली में सर्वोच्च् प्राथमिकता का विषय रहा है। प्रकृति संरक्षण के लिये प्राणोत्सर्ग कर देने की घटनाओं ने समूचे विश्व में भारत के प्रकृति प्रेम का परचम फहराया है।
                 अमृता देवी और पर्यावरण रक्षक बिश्नोई समाज की प्रकृति प्रेम की एक घटना हमारे राष्ट्रीय इतिहास में स्वर्णिम पृष्ठों में अंकित है। सन् 1730 में राजस्थान के जोधपुर राज्य में छोटे से गांव खेजड़ली में घटित इस घटना का विश्व इतिहास में कोई सानी नहीं है।
जोधपुर बसाने वाले राव जोधा जी गुरु जम्भेश्वर जी के ही शिष्य थे। जोधा जी के प्रार्थना करने पर गुरु जम्भेश्वर जी ने ही उन्हें बैरीसाल का नगाड़ा दिया था। गुरु जाम्भोजी की कृपा से ही जोधपुर नगर आबाद हुआ था। उन्ही जोड़ा जी की परम्परा में विक्रम सम्वत 1700 में अजित सिंह जी जोधपुर के राज बने। अजित सिंह जी पूर्णतय धर्मात्मा/धार्मिक राजा थे। ऐसे ही अजित सिंह का पुत्र अभयसिंह हुआ जो अपने पिता के स्वर्गवासी होने के पश्चात राज-सिंहासन पर बैठा। अपने राज्य की सीमा की सुरक्षा के साथ ही राज्य विस्तार की भावना से कई इलाकों पर चडाई कर दी व इस प्रकार अपना अधिकतर समय युद्ध में ही व्यतीत करते थे। 
सन् 1730 में जोधपुर के राजा अभयसिंह को जब युद्ध से थोड़ा अवकाश मिला तो उन्होंने महल बनवाने का निश्चय किया। राजा अभय सिंह के राज में राज्य का सम्पूर्ण कार्य सूत्र भंडारी गिरधर के ही हाथ में था, वह जैसा चाहता था वैसा ही प्रजा से करवा भी लेता था। राज्य पूर्णतय गिरधर के हाथ में चढ़ चूका था, इसीलिए गिरधर की ही मनमानी चलती थी। गिरधर स्वंय ही राजा के पास जाकर कहने लगा कि- हे अन्नदाता ! इस समय राज कोष कि हालत बहुत खराब चल रही है कर्मचारियों की नोकरी के लिए भी पैसे नहीं बचे हैं तथा आपने जो किला बनवाना शुरू किया हुआ है उसके लिए चूने का भट्टा जलाने के लिए इंधन-सामग्री चाहिए। यदि आप आज्ञा दे तो मैं इसकी व्यवस्था कर दूं। मुझे पता चला है की यहाँ पास ही में बिश्नोईयों के गाँव में खेजड़ी के बहुत से वृक्ष है उन्हें कटवाकर लाता हूँ और उस इंधन से चुन जला लिया जाएगा। और अपनी समस्या भी हल हो जायेगी। इस पर राजा अभय सिंह ने उसे समझाते हुए कहा कि बिश्नोई लोग जाम्भोजी के शिष्य हैं, वे तुम्हे हरे वृक्ष नहीं काटने देंगे। तुम्हे खाली हाथ ही लोटना पड़ेगा। तो इस पर गिरधर ने कहा कि कोई बात नहीं अगर वो हमें पेड़ नहीं काटने देंगे तो हम उनके बदले उनसे कुछ रूपये की मांग रख देंगे, और उन रुपयों से हम किसी अन्य जगह से पेड़ों की व्यवस्था कर लेंगे। हमारे तो दोनों ही हाथों में लडडू हैं।
              इस प्रकार गिरधर रजा अभय सिंह को पूर्ण आश्वासन देकर कुछ सिपाहियों के साथ जोधपुर से चल कर 25 किलोमीटर दक्षिण पूर्व में खेजड़ली गाँव पहुंचा और वृक्ष कटवाना शुरू कर दिया। वृक्षों पर कुल्हाड़ी की चोट से पड़ने वाली आवाज़ को वहाँ के लोगो ने सुना तो देखते ही देखते वहाँ पर कई आदमी इकट्ठा हो गए, और उन वृक्षों को काटने वाले आततायी लोगो से कुल्हाड़ी छीन ली और उनको वहां से वापिस भगा दिया। निहत्थे कर्मचारीयों ने जब यह वृत्तांत गिरधर को सुनाया तो गिरधर क्रोधित होते हुए उन बिश्नोई समुदाय के लोगो के पास पहुंचा और कहने लगा की आप लोग हॉट कोण है हमारे कर्मचारीयों को रोकने वाले? हम राजा अभय सिंह के आदेशानुसार ही यहाँ आयें हैं। हमारा अपमान राजा का अपमान है। आप लोग हमें इन पेड़ो को काटने से नहीं रोक सकते। तो इस पर बिश्नोईयों की तरफ से अणदे ने आगे बढकर कहा की हमें पता नहीं था की आप कौन हैं? पर आप जो भी हैं सायद आपको ज्ञात नहीं है की आप बिश्नोई के इलाके में प्रवेश कर गए हैं और यदि आप जोधुपुर से इन पेड़ो को काटने के उद्देश्य से ही आयें हैं तो आप वापिस चले जाएँ इसी में आपका भला है।
                  तो गिरधर ने कहा कि तू गवांर होता कौन है मुझे रोकने वाला, और ऐसा कहते हुए उसने अपने कर्मचारियों को पेड़ काटने का आदेश दे दिया, पर कर्मचारी निहत्थे होने के कर्ण पेड़ काटने का साहस नहीं कर सके, और इस प्रकार से उन कर्मचारियों ने वृक्ष काटने से साफ़ मना करते हुए जोधपुर वापसी कि तैयारी करने लगे। तो इस पर गिरधर ने कहा कि चलो हम पेड़ नहीं काटेंगे पर आपको इसके बदले में रूपये देने होंगे तो बिश्नोईयों ने उसमे भी साफ़ मना कर दिया कि आप हमारी ही इस कमाई से कहीं और जगह से पेड़ कटवाओगे, और ये पाप हम नहीं कर सकते। आप चाहें तो हमारे सिर काट सकते हो पर हम पेड़ो को नहीं काटने देंगे। इस पर गिरधर चुप-चाप वहाँ से जोधपुर के लिए निकल पड़ा। 
                     जाते समय बिश्नोइयो से उसकी दशा से अनुमान लगा लिया था कि अब जरुर कोई बड़ी विपदा आने वाली है क्योंकि वह क्रोध से भरा हुआ था और उसके होठ फड़क रहे थे । इसीलिए हमें चेन से नहीं बैठना चाहिए । दुष्ट व्यक्ति अपनी दुष्टता अवश्य ही दिखाएगा। इसीलिए कि बिश्नोईयों को ये आभाष हो गया था कि अब ये दुष्ट सेना के साथ आ सकता है इसीलिए बिश्नोईयों ने अपने पास के 84 गाँवों को चिट्ठी लिखी जिसमे सारा वृतांत बताने के साथ ही ये भी लिखा कि अब समय आ गया है हमें अपने प्राणों को दांव पर लगाने का, अब समय आ गया है हमें हमारे गुरु के सच्चे अनुयायी कहलाने का इसीलिए जो जो अपना धड कटवाने के लिए तैयार हैं वो जल्दी से जल्दी खेजड़ली पहुंचे। 
               इस पत्र को लिखकर फिर ये पत्र पत्र-वाहकों को देकर भेज और अतिशीघ्र सूचित किया। पत्र मिलते ही 84 गाँवों के लोग आने लगे। कुछ ने गुड़े तो कुछ ने खेजड़ली में आसन लगाया। अब सब गिरधर कि प्रतीक्षा करने लगे। उधर गिरधर खिन मन से जोधपुर पहुंचा और खेजड़ली घटना का बढ़ा-चढ़ा कर सुनाया । राजा भी कुछ क्रोधित हुआ पर जल्द ही शांत भी हो गया। पर गिरधर फिर से कहने लगा कि ये बिश्नोई लोग धरम के नाम पर दिनोदिन उच्छखल होते जा रहे हैं जब तक इनको दण्डित नहीं किया जाएगा तब तक ये इसी प्रकार करते रहेंगे। इसीलिए मेरा तो यही विचार है कि मुझे बहुत बड़ी सेना के साथ वहाँ भेजा जाये, मैं वहाँ के सम्पूर्ण वृक्ष कटवा लाता हूँ ये लोग इन्ही पर ही तो गर्व कर रहे हैं फिर "न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी" तो इस पर अभय सिंह ने कहा कि ये जाम्भोजी के शिष्य हैं ये मर जायेंगे मगर पीछे नहीं हटेंगे, और आज तक हमारे दादा जी से लेकर किसी ने भी निर्दोष पर अत्याचार नहीं किया है, वे हमेशा ही वृक्षों कि रक्षा करते आये हैं, अब अगर मैं ऐसा करूंगा तो मेरा तो कुल ही कलंकित हो जायेगा ना। तुम्हारी बुद्धि ही ना जाने ऐसी क्यों हो गयी है कि वो तुम्हे धरम-विरुद्ध मार्ग पर ही धकेल रही है। इतना बड़ा फैसला लेने से पहले मैं अपनी नगरी के विद्वानों से सलाह लूँगा, आगे कि कारवाही उसकी के अनुसार होगी । 
इस प्रकार जब सभी विद्वानों कि सलाह ली गयी तो सभी ने ही कहा कि धर्म कि मर्यादा जो आपके यहाँ आदि-काल से चली आ रही है उसे नहीं तोडना चाहिए, और फर इन बिश्नोईयों का इसमें निजी स्वार्थ ही क्या है? उनका कार्य तो सर्वजन हिताय है और जो कार्य सर्वसाधारण कि भलाई के लिए हो उसे ज्ञानी लोग धर्म कहते हैं। इसिलए उन्हें मारने की बात तो अपने मन से ही निकाल दीजिये हमारा तो यही मत है अब आपको जैसा उचित लगे वैसा ही करो। तो गिरधर ने राजा के पास आकर कहा कि ये सब तो आपके विरोधी हैं, अगर ये आपके सहयोगी होते तो ये राज्य की उन्नति की ही बात कहते । इधर देखिये आपका किला अधुरा पड़ा है, राजा अगर प्रजा पर शासन नहीं चला सकता तो वह कहाँ का राजा है? इस प्रकार से प्रजा मनमानी करने लग जायेगी तो तुम्हारा शासन डोल जाएगा। 
इस प्रकार से राजा व गिरधर के भीच में बहुत वार्ता हुयी पर अंत में राजा अभयसिंह को गिरधर ने अपने वाकजाल में फंसा ही लिया और एक बड़ी सेना के साथ खेजड़ली जाने की आज्ञा ले ली और आज्ञा मिलते ही देरी न करते हुए जल्दी ही गिरधर बड़ी से सेना और पेड़ काटने वाले मजदूरों के साथ खेजड़ली पहुँच गया। और वहीँ जाकर सेना डेरा लगाया और जगह-जगह अपने पर तम्बू लगा लिए। बिश्नोईयों की ज़मात उस रात सो ना सकी किन्तु गिरधर अपनी योजना को प्रातःकाल में ही सफल करने के विचार कर के रात्रि में मंत्रणा कर के सो गया। बिश्नोई लोग पूरी रात मंत्रणा ही करते रहे की प्रातःकाल में ये दुष्ट अपने सम्पूर्ण बल लगाएगा और निश्चित ही पेड़ काटने का प्रयास करेगा। इसीलिए रात्रि में सभी बिश्नोईयों ने मिलकर ये निर्णय लिया कि हम लोग प्रजा हैं, यह राजा का सेन्यबल है, इन लोगो के पास शस्त्र है हमारे पास नहीं है। इसीलिए अगर हम इनसे युद्ध करते हैं तो जीत नहीं सकते, हिंसा से तो हिंसा अधिक ही होगी। गुरु जाम्भोजी ने कहा है कि "जै कोई आवै हो हो कर ता आपजै हुईये पानी" यदि हम लोग इस सिद्धांत को अपनाए तभी सफल हो सकते हैं इसलिए प्रातःकाल में जब वह गिरधर पेड़ो को कटवाना शुरू करें तो तब जितने भी रुंख काटने वाले इकट्ठे रहेंगे और अलग-अलग पेड़ो को काटेंगे तो उतने ही लोग इन रुंखो से चिपक जायेंगे। शरीर कटवा लेंगे पर रुंखो को नहीं काटने देंगे। किसी प्रकार का सामना नहीं करना है, मन में सहनशीलता धारण करनी होगी, कहीं ऐसा न हो कि आप लोग अत्याचार देखकर उतेजित हो जाओ और युद्ध कर बैठो अगर ऐसा है तो कृप्या पीछे हट जायें। हमें यहाँ शांति से कार्य करना है। उधर सूर्योदय पर गिरधर भंडारी और उसकी सेना उठी और और उठते ही अच्छा मौका देखकर पेड़ काटने शुरू कर दिए। वृक्षों पर कुल्हाड़ी की चोट से पड़ने वाली आवाज़ को जब बिश्नोई समुदाय के लोगो ने सुना तो देखते ही देखते वहाँ पर कई-सौ आदमी इकट्ठा हो गए, सभी नारी-पुरुष अपना जीवन समपर्ण करने आये थे। और तुरंत भगवान् विष्णु को हृदय में धारण करके जिभ्या से भगवान् विष्णु का ही जप करते हुए, गुरु जम्भेश्वर जी को नमन करते हुए वहाँ से 363 बिश्नोईयों(69 महिलाये और 294 पुरूष) ने प्रस्थान किया और जहां वृक्ष काटे जा रहे थे, वहाँ जाकर बिना कुछ बोले-सुने निर्भय होकर रुंखो से चिपक गए। वहाँ पर राजकर्मचारी खेजड़ी पर घाव कर ही रहे थे कि उसी पर इन बिश्नोईयों ने अपने शरीर को रख दिया। उन रुंखो को जो पहले से चोट लग चुकी थी उसके लिए परमात्मा से माफ़ी मांगी आगे के लिए अपना शरीर पेड़ो पर रखते हुए उन पेड़ो को सुरक्षित रख दिया। जो चोट पेड़ो पर पड़ रही थी अब वही शरीरों पर पड़ रही थी। शरीर बिना कोई हुंकार किये ही ये सब झेल रहे थे। इस बलिदान यज्ञ में सर्वप्रथम आहुति देने का श्रेय 42 वर्षीय महिला "अमृता देवी" को मिलता है। 
इनके पीछे इनकी तीन पुत्रियां व पति रामू खोड़ भी थे। इनके बलिदान को देखकर इनकी माता जी कान्हा कालीरावणी ने भी पीछे रहना ठीक नहीं समझा व अपने प्राणों कि आहुति भी दे दी। पुरुषो में सर्वप्रथम अणदोजी वीरता वणियाल चचो जी उधोजी, काह्नोजी तथा किसान जी ने अपने प्राणों कि आहुति खेजड़ी वृक्षों कि रक्षार्थ में दी। देखते ही देखते 363 शरीरों के हाथ-पाँव, सिर-धड़ आदि के टुकड़े-टुकड़े हो कर धरती पर गिरने लगे। धरती खून से लाल हो गयी। यह घटना भादवा सुदी दशमी,मंगलवार, विक्रम संवत 1787 कि है। गिरधर ने जब तक रोकने का आदेश नहीं दिया तब तक वे कर्मचारी शरीर के टुकड़े करते ही रहे। 363 शरीरों के ना जाने कितने ही टुकड़े उन दया-हीन जानो ने किये होंगे, उसका कोई अन्तपार नही है। जब वे कर्मचारी एक एक शरीर क टुकड़े को काट चुके थे तो जब पीछे मुड़कर देखा तो पाया कि अभी भी कई-सौ बिश्नोई समुदाय के लोग इन रुंखो के लिए जान देने के लिए तैयार हैं। तब कर्मचारी लोगों का साहस जवाब दे गया वो सब कुल्हाड़ी फेंक कर जोधपुर के लिए भाग खड़े हुए। सैनिको ने भी उन्ही का ही अनुसरण किया। आते समय जो गिरधर सब से आगे आया था जाते समय वही हारे हुए मन से अपनी हार पर उदास होकर वापिस लोट गया और जोधपुर नरेश को पूरी घटना से अवगत करवाया। अभयसिंह ने इस पर आश्चर्य परकत करते हुए गिरधर को दण्डित किया और कहा कि रे दुष्ट ! यह पाप तुमने किया है किन्तु मेरे शासन अधिकार में हुआ है इसीलिए इसके फल का भागी तो मैं ही हूँ। एक तो वो लोग हैं जो परीक्षों कि रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे रहे हैं और एक तू हैं जो उन्ही के प्राण लेकर आया है। अरे निर्दयी ! कुछ तो दया करनी सीखी होती तूने। इस प्रकार बाद में अभयसिंह खुद भी पश्चाताप कि आग में जलने लगा। 
फिर एक दिन अभयसिंह खुद बिश्नोईयों कि ज़मात में जाकर अपने सिर कि पगड़ी बिश्नोईयों के पैरों में रख दी- और प्रार्थना करते हुए कहा कि ये मेरा ये सिर आपके चरणों में हैं आप चाहे तो इसे काट दे चाहे तो छोड़ दे, मैं आपका अपराधी हूँ। जब तक जिन्दा हूँ तब तक पश्चाताप की आग में जलता रहूँगा। तो बिश्नोईयों ने कहा कि हम तो वृक्षों के लिए प्राण न्योछावर करने वाले हैं हमसे आपका सिर नहीं काटा जाएगा। आप हम पर बस यहीं उपकार करें कि जिन वृक्षों को बचाने के लिए बलिदान दिया है वो वृक्ष कभी ना काटे जाएँ। और अगर कोई काटता है तो उसमे दंड का प्रावधान हो। अभयसिंह ने उनकी बात स्वीकार करते हुए उन बिश्नोईयों को एक पट्टा लिखकर दिया जिसमे भविष्य में ऐसी कोई घटना के ना होने का वचन था। इस वन को हरा-भरा बनवाऊंगा ऐसा कहते हुए अभयसिंह जोधपुर पहुंचा और अपने राज्य में वृक्षों कि रक्षा तथा जीव रक्षा का नियम बना दिया तथा उसका पालन भी सख्ती से होने लगा।

यह खेजडली बलिदान कि घटना 21 सितम्बर 1730, भादवा सुदी दशमी,मंगलवार, विक्रम संवत 1787 का ऐतिहासिक दिन विश्व इतिहास में इस अनूठी घटना के लिये हमेशा याद किया जायेगा। समूचे विश्व में पेड़ रक्षा में अपने प्राणों को उत्सर्ग कर देने की ऐसी कोई दूसरी घटना का विवरण नहीं मिलता है। हमारे देश में केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय तथा सभी राज्य सरकारों द्वारा पर्यावरण एवं वन्यजीवों के संरक्षण के लिये अनेक कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। हमारे यहां प्रतिवर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय के तत्वावधान में एक माह की अवधि का राष्ट्रीय पर्यावरण जागरूकता अभियान भी चलाया जाता है। यह विडम्बना ही कही जायेगी कि हमारे सरकारी लोक चेतना प्रयासों को इस महान घटना से कहीं भी नहीं जोड़ा गया है। हमारे यहां राष्ट्रीय पर्यावरण दिवस के लिये इस महान दिन से उपयुक्त कोई दूसरा दिन कैसे हो सकता है? आज सबसे पहली आवश्यकता इस बात की है मे  पर्यावरण नरपतसिंह बाडमेंर जो कि.विश्व कि सबसे लम्बी साईकिल यात्रा मे 363 शहीदों को शहीद का दर्जा दिलाने के लिए मुहिम को जोडुगा कि 21 सितम्बर के दिन को भारत का पर्यावरण दिवस घोषित किया जाये यह पर्यावरण शहीदों के प्रति कृतज्ञ राष्ट्र की सच्ची श्रृद्धांजलि होगी और इससे प्रकृति सरंक्षण की जातीय चेतना का विस्तार हमारी राष्ट्रीय चेतना तक होगा, इससे हमारा पर्यावरण समृद्ध हो सकेगा।

Post by
पर्यावरण प्रेमी नरपत सिंह राजपुरोहित

मंगलवार, 18 सितंबर 2018

संपादकीय : समझौते वाली सड़क.....

संपादकीय
 समझौते वाली सड़क .........

#बाड़मेर #नगरपरिषद #वार्ड_नं_6
17.09.2018
मेरी गली में पिछले 12 सालों से सड़क पाइप लाइन बिछाने के कारण क्षतिग्रस्त थी पिछले 8 सालों में लगातार नगर परिषद व पार्षद से अनुरोध करते रहे कि हमारी गली की सड़क का नवीनीकरण किया जाए पिछले पार्षद का 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा हो गया और आश्वासनों के तले सड़क दबी रह गई बन नहीं पाई ।

नया पार्षद सड़क बनाने के वादे के साथ आया 3 साल तक आश्वासन देते देते निकल गए वही नगर परिषद के चक्कर कुछ महीनों के अंतराल में लगते गए लेकिन सड़क का नवीनीकरण नहीं किया गया। फिर 2016 में जिला स्तरीय जनसुनवाई में जिला कलेक्टर महोदय के पास प्रार्थना पत्र लेकर पहुंचा और जनसंपर्क पोर्टल पर शिकायत का ऑनलाइन रजिस्ट्रीकरण किया गया जनसंपर्क पोर्टल से कॉल आते तो कभी नगरपरिषद से कॉल आते हैं 5 बार इंजीनियर आके मौका मुआयना करके गए और पता नहीं 10x100 की गली की सड़क के ऊपर किस आधार पर 5 लाख का पश्मीना बनाकर सभापति व आयुक्त के सामने पेश कर दिया और नगर परिषद द्वारा भविष्य में बजट आवंटन की दलील देते हुए झूठे आश्वासन दिए गए अब तक की कार्यवाही में पार्षद की कोई सकारात्मक भूमिका नहीं रही।

इस कालखंड के बीच में दो तीन बार पार्षद ने हमारी बार-बार मांग को देखते हुए फॉर्मेलिटी के लिए हमें सड़क के ऊपर ही नई सड़क बनाने की बात कही लेकिन गली वालों की मांग थी कि 12 सालों में जाकर अब कार्य की जरूरत पड़ी है वह इतने से छोटी सड़क को भी बिना खोदकर आप पूरानी सड़क के ऊपर ही बनाने की बात कर रहे हैं और धीरे-धीरे ऐसे ही ऊपर सड़क बनाते-बनाते सड़क का लेवल घरों के आंगन के लेवल के बराबर आ जाएगा और फिर सड़क की गंदगी घर के अंदर आ जाएगी इसलिए यह हमेशा-हमेशा नहीं बनाई जाती CC की सड़क परमानेंट सही ढंग से खुदाई करके अच्छे से बनवा दी जाए तो और आने वाले 10 सालों तक सामने नहीं देखना पड़ेगा सड़क के लेकिन पार्षद तो अपने मनमानी पर है आम जनता की समस्या का उसके साथ क्या लेना देना यह कहकर बस चल दिए कि आप खुद नहीं बनाना चाहते सड़क मैं क्या कर सकता हूं ? नहीं बनानी तो रहने दीजिए जैसी है वैसी पड़ी रहेगी और क्या ।

उसके बाद हम दो बार और जनसुनवाई में जिला कलेक्टर महोदय के पास पहुंचे इस बीच एक बार तो तत्कालीन नगर परिषद आयुक्त ने हाथाजोड़ी करके हमको वहां से झूठा आश्वासन देकर वापस भेज दिया कि कल ही मैं खुद निरीक्षण करने आऊंगा और 15 दिन के अंदर अंदर आप की गली में सड़क नवीनीकरण का कार्य शुरू कर दिया जाएगा हम भी भोले-भाले लोग उनकी झूठी दलील में आ गए और कलेक्टर के पास नहीं जा कर वापस आ गए उस बात को भी एक साल होने आ गया है लेकिन कोई कार्यवाही नहीं की गई ।

अब वर्तमान में सितंबर 2018 चल रहा है आने वाले 3 महीनों में राजस्थान विधानसभा के चुनाव होंगे जिसके लिए आचार संहिता लग जाएगी इसलिए सरकारी कार्यों का यह अंतिम टेंडर जारी किया गया है जो पूरे वार्ड के लिए है लेकिन हमारी मांग अभी भी अधूरी की अधूरी है उस पर कोई अमल नहीं किया गया है जब भी जाओ 2 महीने में आपकी सड़क बन जाएगी 3 महीने में आपकी सड़क बन जाएगी ऐसे झूठे आश्वासन सुन-सुनकर कान पक गए हैं तो विधानसभा चुनाव के मद्देनजर आने वाले तीन चार महीनों तक कोई काम नहीं होने वाला है ।

उसके बाद आ जाएंगे लोकसभा के चुनाव फिर आचार संहिता लगेगी फिर 2-4 महीने कोई काम नहीं होने वाला है और उसके बाद में आ जाएंगे नगर परिषद के चुनाव कहने का मतलब यही है कि आने वाले 1-2 सालों तक कोई काम नहीं होने वाला है आम जनता का इसलिए पिछले 12 सालों से टूटी फूटी सड़क की हालत को झेल रहे गली वासियों ने हालातों और समय की परिस्थितियों को देखते हुए मजबूरन का समझौता किया कि टूटी फूटी सड़क से तो अच्छा है इसके ऊपर इस बार सड़क बना दी जाए और क्या कर सकते हैं और आने वाले समय में ऐसी हालत में रहने से अच्छा है सड़क के ऊपर ही सड़क बनाकर फिलहाल काम चलाया जाए।

और आने वाले भविष्य में जब चुनाव में वोट मांगने के लिए नेताजी आएंगे तब उनको खरी-खोटी सुनाते हुए अगली बार सड़क खुदाई करके अच्छी क्वालिटी की वापस सड़क बनाने का लिखित में वादा लेते हुए और अगर अपने वादे से मुकर जाते हैं तो कठोर कार्यवाही के लिए तैयार रहें इस समझौते के साथ सड़क निर्माण के लिए गली वासियों में सहमति बनाई इसलिए मैंने अपने इस संपादकीय लेख का शीर्षक समझौते वाली सड़क दिया है आइए बताते हैं यहां पर किस प्रकार का जनता का समझौता किया गया है :
* समझौता राजनीतिकरण का शिकार होने का
* समझोता नगर परिषद की असंवेदनशीलता का 
* समझोता पार्षद की हमारी मांग के लिए पैरवी ना करने का
* समझौता आचार संहिता के कारण काम ना होने का
* समझौता समय व परिस्थितियों के साथ सभी का एकजुट होकर ना लड़ने का
हालांकि अब यह समझौतावादी सड़क तो बन गई है जिससे पहले की अपेक्षा बच्चों को सड़कों में पड़े गड्ढों उसके साथ ठोकरें नहीं खानी पड़ेगी गली वालों की मोटर साइकिल व साइकिल आराम से चल पाएगी गंदा पानी सड़क के गड्ढों में इकट्ठा नहीं होगा इससे कुछ निजात मिलेगी लेकिन मन में एक ठीस जरूर रहेगी कि हम जिनको हमारे कार्य करने के लिए जनहित में पैरवी करने के लिए वोट करते हैं और वह वादाखिलाफी करके पार्टी वाद, जातिवाद, पक्षपात, ईर्ष्या के भाव से काम करते हैं जिससे विकास की प्रेरणा कहीं पीछे छूट जाती है और राजनीति के प्रति कुंठा पैदा होती है।

पार्षद द्वारा की गई भेदभाव पूर्वक नीति के कुछ उदाहरण निम्न बातों से मैं पेश करता हूं :-
* पिछले 12 सालों से सड़क टूटी हुई है पिछले पार्षद को सैकड़ों बार अवगत कराने के बावजूद जानबूझकर बाकी पूरे मोहल्ले में सड़के बनवाई गई और भेदभाव पूर्ण रवैया अपनाते हुए हमारी गली को उपेक्षित रखा गया
* दूसरा पार्षद यह वादा करके आया था कि पहला काम इसी गली में शुरू कराऊंगा लेकिन वह भी था तो उसी पार्टी का बहानेबाजी करके वह भी टालता गया
* पिछले 3 सालों में एक ही सड़क को हर साल सही होने के बावजूद खुदाई करके बार-बार बनाया गया और अभी 4 दिन पहले उस सड़क को खोदकर सीसी सड़क बनाई गई जनता का पैसा गैर जरूरत जगह पर खर्च किया गया
* हमारी 10x100 फीट की गली में सड़क बनाने के लिए मुश्किल से एक डेढ़ लाख का खर्च आता लेकिन जानबूझकर 500000 का बजट बनाकर इस को निष्क्रिय किया गया
* पार्षद को बार-बार कहने के बावजूद कलेक्टर तक राज्य सरकार तक जनसंपर्क के माध्यम से शिकायत पहुंचाने के बावजूद कार्य ना होना और असंवेदनशीलता व फॉर्मेलिटी के लिए सब काम किया जाना बताता है ऊपर से पार्षद द्वारा यह कहना कि आप की सड़क खुदाई करके नहीं बनाई जाएगी आप में हिम्मत हो तो जो भी करना है कर लो और उसने यह साबित भी कर दिया।

वेदना पूर्वक महावीर आचार्य 
आम नागरिक भारत
नोट :- पिछले 5 सालों में लगातार अलग-अलग स्तर पर सड़क नवीनीकरण की मांग को लेकर किए गए प्रयास के बारे में लिंक नीचे दिए गए हैं और YouTube पर अपलोड किया गया वीडियो का भी लिंक सबसे पहले ऊपर दिया गया है
1. क्षतिग्रस्त सड़क का वीडियो का लिंक
https://youtu.be/KIIRP8aiLhM
2. 2013 की अखबार की न्यूज़ कटिंग
 http://mahaveeracharya.ucoz.com/rajward.jpg
3. 9 जून 2016 को जनसुनवाई में जिला कलेक्टर को दिए गए ज्ञापन का लिंक
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=971713536259925&id=100002638628325
4. 13.04.2017 को दूसरी बार जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा उसका लिंक
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1582477081850231&id=100002638628325

बुधवार, 12 सितंबर 2018

इस शुभ मुहूर्त पर करें गणेश चतुर्थी पूजा, बप्पा के आशीर्वाद से जीवन होगा खुशहाल


नई दिल्ली: देश भर में गणेश चतुर्थी का त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है. भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को श्री गणेश चतुर्थी के नाम से मनाया जाता है. इस साल चतुर्थी का त्योहार 13 सितंबर 2018 को पड़ रहा है. अगर इस दिन की पूजा सही समय और मुहूर्त पर की जाए तो हर मनोकामना की पूर्ति होता है. ऐसा माना जाता है कि गणपति जी का जन्म मध्यकाल में हुआ था इसलिए उनकी स्थापना इसी काल में होनी चाहिए.
गणेश चतुर्थी का शुभ मुहूर्त 
भगवान गणेश का जन्म दोपहर में हुआ था, इसलिए इनकी पूजा दोपहर में होती है. वैसे गणेश जी का पूजन प्रातःकाल, दोपहर और शाम में से किसी भी समय किया जा सकता है, लेकिन चतुर्थी के दिन मध्याह्न 12 बजे का समय गणेश-पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है. मध्याह्न पूजा का समय गणेश-चतुर्थी पूजा मुहूर्त के नाम से ही जाना जाता है, इसीलिए पूजा का शुभ मुहूर्त दोपहर 12 बजे से रात 12 बजे तक होता है. चतुर्थी तिथि गुुुरुवार 13 सितंबर को पूरे दिन रहेगी इसलिए गणेश जन्मोत्सव की पूजा और स्थापना इस दिन कभी भी कर सकते हैं. 
कैसे करें पूजा
चतुर्थी के दिन प्रातः काल उठकर सोने, चांदी, तांबे और मिट्टी के गणेश जी की प्रतिमा स्थापित कर षोडशोपचार विधि से उनका पूजन करते हैं. पूजन के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर ब्राह्मणों को दक्षिणा देते हैं. मान्यता के अनुसार इन दिन चंद्रमा की तरफ नहीं देखना चाहिए. इस पूजा में गणपति को 21 लड्डुओं का भोग लगाने का विधान है.