(विपिन सोलंकी).कोरोनावायरस में लाॅकडाउन का एक ही सकारात्मक परिणाम आया वाे है, बेहतर पर्यावरण। प्रदूषण का स्तर कम और हवा भी साफ हो गई हैं। उदयपुर संभाग अपनी भाैगाेलिक बनावट के कारण प्रकृति, वन्यजीवाें, जलाशयाें की दृष्टि से समृद्ध है। संभाग में ही सात वन्यजीव अभयारण्य हैं जाे 2237 वर्ग किमी वन क्षेत्र में फैले हैं। खासियत यह है कि प्रदेशभर में चाैसिंगा, उड़न गिलहरी, ऑर्किड पाैधा और भालू सिर्फ यहीं पाए जाते हैं। अनिज रोजर्स ने बताया कि इस साल की थीम भी जैव विविधताओंका जश्न हैं। भास्कर अभयारण्यों पर एक रिपाेर्ट...
उदयपुर से 50 किमी दूर जयसमंद क्षेत्र में 52 वर्ग किमी में फैला है। यहां वन्यजीवों में पैंथर, चीतल, सांभर, चिंकारा, जंगली सूअर, जरख, सियार, लोमड़ी, सिवेट, सेही, अजगर, खरगोश, लंगूर, जंगल कैट, नीलगाय माैजूद है। पक्षियों में पेंटेड फ्रेंकोलिन और सेंडग्राउज भी यहां काफी तादाद में हैं। यहां के वनाें में कई औषधीय पाैधे और महत्वपूर्ण पेडों की प्रजातियां माैजूद हैं। प्रसिद्ध जयसमंद झील भी इसी वन्यजीव क्षेत्र में हैं, जाे पर्यटकाें के लिए पिकनिक स्पाॅट है।
बस्सी वन्यजीव अभयारण्य

यह चित्तौड़गढ़-कोटा मार्ग पर हाइवे से कुछ ही दूरी पर 138.69 वर्ग किलोमीटर में क्षेत्र में फैला है। यहां भी पैंथर, चिंकारा सहित अन्य वन्यजीवाें के साथ चाैसिंघा, मगरमच्छ की भी काफी संख्या है। यहां क्रेस्टेड हाॅक ईगल, क्रेस्टेड सर्पेंट इगल, डस्की इगल आउल, मोटल्ड वुड आउल, इंडियन स्काॅप्स आउल, स्पोटेड आउलेट, इंडियन इगल आउल पक्षी माैजूद है। वन क्षेत्र में धाेक और खेर के पेड़ बहुतायत में है।
कुंभलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य

राजसमंद-उदयपुर जिले में 610.52 वर्ग किमी क्षेत्रफल में फैला है। यहां पैंथर, भालू सहित अन्य वन्य जीव ताे है ही साथ ही संभाग में सबसे ज्यादा सांभर और भेड़िए भी यहीं पाए जाते हैं। कुंभलगढ़ टाइगर को रि-लोकेट करने के लिए सबसे उपयुक्त जगहों में से एक हैं। यहां इंडिया एंडेमिक ग्रीन मुनिया और राजस्थान एंडेमिक अरावली रेड स्पर फाउल पक्षी के साथ छोटे पक्षी जैसे इंडियन पेरेडाइस, फ्लाई कैचर, ब्राउन हैडेड बार्बेट, पेंटेड सेंड ग्राउस, चेस्टनट बेलीड सेंडग्राउस, इंडियन वलचर की भी अच्छी तादाद है।
सज्जनगढ़ वन्यजीव अभयारण्य : उदयपुर शहर से सटा हुआवन क्षेत्र करीब 5.19 वर्ग किमी क्षेत्रफल में फैला है। इसकी सीमा से सटा 27.7 वर्ग किमी एरिया इको संेसेटिव जोन घोषित है। यहां तेंदुए, चीतल, नीलगाय, जंगली सुअर, सियार, लंगूर, सेही, खरगोश, सीवेट काफी संख्या में हैं। छोटे पक्षी इंडिया एंडेमिक, व्हाइट नेप्ड टिट और व्हाइट बेलीड मिनिवेट खास हैं। रेप्टाइल्स में यहां शाॅर्ट टोड स्नेक इगल पाए जाते है। इसके अलावा रस्टी स्पोटेड कैट, जंगली बिल्ली और उल्लू प्रजाति में स्पोटेड आउलेट इंडियन स्काॅप्स आउल, मोटल्ड वुड आउल भी देखे जा सकते हैं।
फुलवारी की नाल

शहर से 70-80 किमी दूर 511.41 वर्ग किमी में फैला है। यहां पैंथर, जंगली सुअर, जरख, सियार, लोमड़ी, सिवेट, सेही, खरगोश, लंगूर, बंदर, जंगली बिल्ली, जंगली मुर्गा, नीलगाय के साथ भालू, चिंकारा, चाैसिंगा माैजूद है। यहां की विशेषता यह हैं कि सीतामाता के बाद प्रदेश में दुर्लभ उड़न गिलहरी केवल यहीं पाई जाती है। ऑर्किड और फर्न भी हैं। धारीदार उभार वाली पहाड़ियों के लैंड स्केप के बीच अाैषधीय पाैधाें की बहुतायत हैं। भालुओं का अच्छा हैबिटाट है।
टाॅडगढ़ रावली अभयारण्य

495.27 वर्ग किमी क्षेत्र में फैला है। टाइगर रिजर्व बनने पर कुंभलगढ़ और रावली-टाॅड़गढ को जोड़ दिया जाएगा। जंगली मुर्गा काफी तादाद में हैं। इस क्षेत्र में गोरमघाट का जोगमंडी झरने सहित अरावली शृंखला का सबसे ऊंचा भील बेरी झरना है।
सीतामाता अभयारण्य : प्रतापगढ़ जिले में 424 वर्ग किमी में फैला है। सागवान के जंगल हैं, जो अरावली और विंध्याचल शृंखलाओंके मिश्रण से बने हैं। मकड़ियों की प्रजाति में जाइंट वुड स्पाइडर है। जाले में छोटी चिड़ियाएं तक फंस जाती हैं। मुख्य रूप से उड़न गिलहरी के लिए भी प्रसिद्ध है।
Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today Via Dainik Bhaskar https://ift.tt/1PKwoAf
0 comments:
एक टिप्पणी भेजें