(आशीष जैन) दुनिया कोरोना से डर रही है और कोरोना शायद बच्चों से डर रहा है! यही वजह है कि काेटा में अब तक 839 बच्चे काेराेना संक्रमित हाे चुके, लेकिन किसी की माैत ताे दूर ऑक्सीजन की भी जरूरत नहीं पड़ी। सामान्य दवाओं से ही सभी बच्चे रिकवर हाे गए। कुछेक बच्चाें काे जरूर हल्के एंटी बायाेटिक्स देने पड़े। इनमें से 90 फीसदी बच्चाें में ताे लक्षण भी नहीं थे। उनके माता-पिता, दादा-दादी या परिवार के अन्य सदस्य संक्रमित हुए और परिवार के टेस्ट कराए गए ताे वे संक्रमित मिले।
यह काेराेना काल की सबसे सुखद स्थिति है कि काेटा में बच्चाें का रिकवरी रेट 100 प्रतिशत रहा है। यहां बीते 8 माह में 1 दिन से 15 साल तक उम्र के 839 बच्चे संक्रमित हुए हैं। करीब 152 प्रसूताएं भी संक्रमित रही, लेकिन मां से बच्चाें में संक्रमण ट्रांसफर हाेने का एक भी मामला सामने नहीं आया।
एक बच्चा जरूर डिलीवरी के पहले दिन पाॅजिटिव हुआ, लेकिन डाॅक्टरों में इस बात पर संशय है कि उसे मां से संक्रमण मिला हाेगा। यानी संक्रमित मां की काेख से जन्मे सभी बच्चे जांच में निगेटिव निकले। हां, डाॅक्टराें ने इनकी ब्रेस्ट फीडिंग से लेकर देखभाल में सावधानी जरूर बरती। काेराेना काे हंसते-खेलते मात दे रहे बच्चाें में क्या है इसकी वजह? पढ़िए रिपाेर्ट-
ये है वजहः इम्युनिटी पावर और वैक्सीनेशन के कारण बच्चों को नहीं हो रहा गंभीर संक्रमण
शिशु राेग विभाग के एचओडी डाॅ. अमृत लाल बैरवा ने बताया कि हमारे यहां शुरुआती दिनाें में जब सभी काे एडमिट करने के निर्देश थे, उसी वक्त बच्चाें काे एडमिट किया जाता था। लेकिन अब न्यू बाॅर्न काे छाेड़ शेष सभी बच्चे हाेम आइसाेलेशन में ठीक हाे रहे हैं। न्यू बाॅर्न काे भी इसलिए रखा जाता है, क्याेंकि उनकी मां एडमिट हाेती है।
हालांकि न्यू बाॅर्न संक्रमित हाेने के बहुत कम मामले हैं। हमने इन 8 माह में 152 उन न्यू बाॅर्न बच्चाें के सैंपल कराए, जिनकी मां डिलीवरी से पहले या बाद में पाॅजिटिव थी। इनमें से सिर्फ 5 बच्चे पाॅजिटिव आए और इनमें से 1 ही बच्चा था, जाे डिलीवरी के पहले दिन संक्रमित पाया गया। बाकी बच्चाें काे बाद में संक्रमण हुआ।
दुनियाभर में हुए रिसर्च में अब तक यह बात साबित नहीं हुई है कि मां से बच्चे में संक्रमण ट्रांसमिट हाे सकता है, इसलिए इस एक बच्चे के मामले में भी हम यह नहीं मान सकते। संभव है कि डिलीवरी के तत्काल बाद उसे बाहर कहीं से संक्रमण मिल गया हाे।
उम्र छोटी... लेकिन ताकत बड़ी
इम्युनिटी : बच्चे पहले दिन से ही मां से इम्युनिटी लेकर पैदा हाेते हैं। इनकी यही इम्युनिटी किसी भी बीमारी से लड़ने में मदद करती है, जाे सामान्य लाेगाें के मुकाबले कहीं ताकतवर हाेती है।
टीके : जन्म के साथ ही बच्चाें काे पाेलियाे, बीसीजी, राेटा वायरस, रूबैला के टीके लगने शुरू हाे जाते हैं। कई स्टडी में यह माना गया है कि इससे बच्चाें में क्राॅस एंटीबाॅडी डवलप हाेती है, जाे वायरस से लड़ने में मदद कर रही है।
काेमाॅर्बिडिटी : बच्चाें में काेमॉर्बिडिटी यानी काेविड के लिहाज से गंभीर मानी जाने वाली दूसरी बीमारियां नगण्य हैं। जैसे डाइबिटीज, हाइपरटेंशन, किडनी या कार्डियक डिजीज। इसलिए इनमें काॅम्पलिकेशन भी नहीं हुए।
5 से 7 दिन के बीच ही हो गए रिकवर
एसिम्प्टोमैटिक : इन बच्चों को कोई दवा देने की बजाए मल्टीविटामिन टैबलेट्स दी, लेकिन इलाज संबंधी कोई दवा नहीं दी गई। सभी बच्चों के फ्लूड इंटेक व डाइट पर विशेष फोकस रखा और उनके परिजनों को भी इसे लेकर समझाते रहे।
माइल्ड सिम्प्टोमैटिक : हल्के लक्षण वाले बच्चाें काे सिर्फ एजिथ्रोमाइसीन दवा दी गई और कुछ बच्चों के एक्सरे में हल्का निमोनिया नजर आया तो उन्हें एमोक्सिक्लेव एंटीबायोटिक्स दी गई।
सीवियर : इस श्रेणी में कोई बच्चा नहीं पहुंचा। इस स्थिति में एंटी वायरल ड्रग देनी होती है, लेकिन अब तक किसी भी बच्चे को इस दवा की जरूरत नहीं पड़ी। परिवार में सभी लोगों के पॉजिटिव होने के बावजूद कोई बच्चा इस स्थिति में नहीं पहुंचा।
ऑक्सीजन-वेंटिलेटर तो दूर कई को दवा की भी जरूरत नहीं पड़ी
डाॅ. अमृतलाल बैरवा ने बताया कि 1 माह से 15 साल उम्र के 834 बच्चे पाॅजिटिव आए हैं, इनमें से भर्ती हाेने की जरूरत किसी भी बच्चे की नहीं थी। चूंकि शुरुआती दिनाें में निर्देश थे कि सभी पाॅजिटिव मरीजाें काे हाॅस्पिटल में रखा जाए, इसलिए उस वक्त बच्चे एडमिट किए गए। इसके बाद ताे किसी भी बच्चे काे हाॅस्पिटल में नहीं रखा गया। इनमें भी 90 प्रतिशत बच्चे ऐसे थे, जिनमें किसी तरह के लक्षण नहीं थे।
जिन बच्चाें में लक्षण थे, वे भी माइल्ड कैटेगरी वाले थे, बहुत ज्यादा सीवियर श्रेणी में काेई बच्चा नहीं पहुंचा। माइल्ड कैटेगरी वाले बच्चे सामान्य एजिथ्राेमाइसीन जैसी दवाइयाें से ठीक हाे गए। हाेम आइसाेलेशन में रहे ज्यादातर बच्चाें काे दवाइयाें की जरूरत नहीं रही। इनमें सबसे महत्वपूर्ण चीज यह है कि ऐसे बच्चाें के फ्लूड इंटेक पर विशेष ध्यान दिया जाए। ज्यादा तरल पदार्थ देते रहें।
जब बच्चाें की वजह से मुस्कुराया नए अस्पताल का काेविड वार्ड
- रामपुरा क्षेत्र की 4 साल की बच्ची अपने दादा-दादी से काेराेना संक्रमित हाे गई। डाॅक्टराें ने उसे एडमिट करने काे कहा ताे मां ने अकेले छाेड़ने से मना कर दिया। फिर मां भी उसके साथ वार्ड में रही, पूरे 14 दिन बच्ची के साथ रही मां निगेटिव रही और डिस्चार्ज के बाद हाॅस्पिटल काे डाेनेशन दिया। इस बच्ची काे देख न सिर्फ डाॅक्टर बल्कि दूसरे मरीज भी मुस्कुरा देते थे।
- बूंदी जिले के नैनवां की एक महिला की टाेंक में डिलीवरी हुई और वहीं कराई गई जांच में वह संक्रमित मिल गई। उन दिनाें पूरे संभाग के मरीज काेटा में ही रखे जाते थे, ऐसे में महिला काे यहां एडमिट कर लिया गया। बच्चे काे उससे अलग रखा, लेकिन परिवार की एक महिला सदस्य काे रहने की इजाजत दी गई। जब भी पीपीई किट पहने डाॅक्टर उसे देखने जाते ताे गाेद में लेकर खिलाने लगते।
- बारां के एक माेहल्ले के करीब 20 बच्चे एक साथ पाॅजिटिव मिले थे। इन बच्चाें काे नए अस्पताल के वार्ड में रखा गया। डाॅक्टराें के लिए ये बच्चे मुसीबत बन गए। ये पूरे समय हाॅस्पिटल में दाैड़ते, खेलते-कूदते रहते। इनके लिए स्टाफ लगाना पड़ा।
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