करगिल युद्ध को 21 साल पूरे हो गए। शेखावाटी के कई लाडलों ने इसमें अपनी शहादत दी। हमारे और आपके पास उनके साहस के कई किस्से सुनने सुनाने के लिए हैं, लेकिन इस बार दैनिक भास्कर आपको ऐसी कुछ यादें दिखा रहा हैं। जो इन शहीदों के परिजनों के लिए प्राणों से भी ज्यादा प्यारी हैं। शहीदों की आखिरी निशानी। जिनमें उनकी यादें बसी हैं। जिन्हें दिखाते दिखाते किसी मां का गला भर आया तो किसी वीरांगना की आंखों में आंसू और पिता के शब्द लड़खड़ाने लगे, लेकिन फिर वे कहते हैं कि शायद हम से ज्यादा उन पर देश का हक था। इसीलिए वे देश की माटी के लिए काम आ गए।
टीटनवाड़ : शहादत से छह माह पहले किया था गृह प्रवेश, वही उनकी याद है
झुंझुनूं | उदयपुरवाटी तहसील के टीटनवाड़ गांव के श्रीपाल सिंह शेखावत 26 जुलाई 1999 को वीरगति को प्राप्त हुए। इस युद्ध से पहले वे जनवरी में घर आए थे। 23 जनवरी को उन्होंने अपने घर का मुहूर्त किया था। कुछ दिन बाद वे ड्यूटी पर चले गए। 26 जुलाई को दुश्मन से लोहा लेते हुए वे शहीद हो गए। उनके बेटे संग्राम सिंह बताते हैं कि आज यह घर ही उनकी आखिरी निशानी है। इसमें कई चीजें आज भी वैसे ही रखी हैं।
बिशनपुरा : मरणोपरांत मिला वीरचक्र ही कहता है उनकी वीरता की कहानी
झुंझुनूं | बिशनपुरा के हवलदार शीशराम गिल वीरता का दूसरा नाम थे। 11 जुलाई 1999 को वे कारगिल की पहाड़ियों में एक हमले में शहीद हो गए। यह एक संयोग था कि इससे महज 12 दिन पहले वे गांव आए थे। इसके बाद वापस लौट गए। बेस्ट फायरिंग पर उन्हें सिपाही से लांस नायक बनाया गया था। कारगिल युद्ध में उनकी वीरता के कारण उन्हें मरणाेपरांत वीरचक्र प्रदान किया गया। जो उनकी वीरांगना संतरा देवी ने प्राप्त किया। आज यही वीरचक्र उनकी वीरता की आखिरी निशानी है।
बसावा : जवान का आखिरी पत्र आज भी करवाता है उनके होने का अहसास
झुंझुनूं | बसावा के दशरथकुमार यादव 6 जुलाई 1999 को युद्ध भूमि में थे। इसी बीच दुश्मन का एक बम उन पर गिरा और वे शहीद हो गए। इससे कुछ दिन पहले ही जून में उन्होंने पत्र लिखा था। यही पत्र उनकी आखिरी निशानी है। वीरांगना दुर्गादेवी ने इसे संभाल कर रखा है। वे बताती हैं कि यह पत्र उनके होने का आभास करवाता है। शहीद पुत्र योगेंद्र एमबीबीएस कर रहा है। यह पत्र उसके लिए बेशकीमती है।
शहीद बेटे का टेप रिकॉर्डर, जब भी बेटा याद आता है मां इसे बजाती है
झुंझुनूं | नंगली गुजरान के खड़गसिंह। देश के लिए हमेशा आगे रहने का उनका उत्साह अलग ही था। कारगिल में जिले से सबसे पहले शहादत भी खड़गसिंह ने दी। 6 मई 1999 को दुश्मन ने हमला किया ही था कि उसका सामना खड़गसिंह जैसे वीर से हुआ। जिन्होंने उसे आखिरी सांस तक रोके रखा। शहादत से महज 1 महीने पहले ही वे गांव आए थे। मां पतासी देवी बताती हैं उसे टेप रिकॉर्डर बहुत पसंद था। जो उनकी आखिरी निशानी है। एक टॉर्च और टिफिन भी है जो मां ने संभालकर रखा है।
मेरे 16 साथी शहीद हो चुके थे, लेकिन हम खालूबार चोटी से दुश्मन को खदेड़ कर ही लौटे
पिछले 21 साल में मैं कारगिल को एक दिन भी नहीं भूला पाया हूं। यह अप्रेल मई का महीना था। हमारी यूनिट 22 ग्रेनेडियर हैदराबाद पीस में तैनात थी। उस वक्त मैं अपने गांव धनूरी आया हुआ था। युद्ध की आहट पर मैसेज मिलने के बाद मैं पहले हैदराबाद पहुंचा और वहां से दूसरे तीसरे दिन हमारी पूरी यूनिट 18 हजार फीट ऊंचाई पर बटालिक के बर्फीले पहाड़ों में थी। जहां ठंडी हवाएं ऐसी थी कि शरीर को चीर दें। बर्फ ने जैसे हमारी सांसों को जमा दिया था। विशालकाय खड़ी चट्टानें। रात के अंधेरे में पांच कदम की दूरी पर क्या है यह देख पाना भी संभव नहीं था।
दुश्मन ऊंचाई पर था। हमारी चोटियों पर उसका कब्जा था। वह कब कहां से हमला कर दे। कुछ पता नहीं था, लेकिन प्रत्येक भारतीय जवान शायद मृत्यु को चुन चुका था। इसलिए मृत्यु का कोई भय ही नहीं रहा था। इसी जज्बे के साथ हम आगे बढ़ते गए। हमारी यूनिट के 16 जवान एक एक कर शहीद होते गए, लेकिन पूरी यूनिट डटी रही। इसी बीच दुश्मन की ओर से आए दो हैलिकॉप्टर ने हम पर हमला कर दिया। ये हैलिकॉप्टर हमें जिंदा ले जाना चाहते थे। जिस पर हमने कुछ दूर पीछे चल रही आर्टिलरी के एसओएस से ओवर सौल फायर मांगा।
आखिर दुश्मन पश्त हुआ। उसे उल्टे पांव लाैटना पड़ा। हमारी यूनिट ने खालूबार रिज चोटी पर तिरंगा फहराया। यह भी गर्व की बात है कि इस यूनिट को शेखावाटी के ही लाल जूलियासर सालासर निवासी मेजर अजीत सिंह शेखावत लीड कर रहे थे।
उन चट्टानों से एक पत्थर भी गिरता तो वह बम समान लगता था, लेकिन कोई पीछे नहीं हटा
आपने करगिल पर कई फिल्में देखी होंगी। जिनमें जवानों को विशालकाय पहाड़ों की खड़ी चट्टानों पर बिना किसी रस्से के चढ़ते दिखाया गया है। यह कोई फिल्मी कहानी नही है। हकीकत है। कारगिल की एक एक चोटी पर वापस तिरंगा फहराने के लिए भारतीय सेना का जवान ऐसे ही चढ़ा था। कंधे पर 50-50 किलो वजन और ऊपर से बरसती दुश्मन की गोलियां। इस बीच कई बार चट्टानों के पत्थर टूटकर हम पर गिरते तो लगता था जैसे बम गिरा हो। वह दिन मुझे आज भी याद है। 25 मई थी। हम श्रीनगर के खेरु में थे।
हमारी जाट रेजिमेंट थी। बटालियन को आदेश हुआ कि करगिल पहुंचना है। हम 29 मई को रवाना होकर 30 को करगिल पहुंच गए। करगिल के पहाड़ जाट बलवान जय भगवान से गूंज उठी थी। हमें ऊंची चोटी पर जाना था। जहां से एक नाला गुजरता था। दुश्मन से सोचा की हम उसी से आयेंगे, क्योंकि उसके अलावा कोई दूसरा रास्ता ही नहीं था, लेकिन हमने चट्टानों पर रेंगते हुए दूसरी तरह से जाना का फैसला किया। यहां हमारी पाकिस्तानी सैनिकों से हाथापाई भी हुई। हमने अब पोस्ट पर वापस कब्जा कर लिया था।
हमारे सामने एक और पोस्ट थी। जिस पर दुश्मन बैठा था। वहां हमारी सेना की दूसरी टूकड़ी को आना था, लेकिन वह नहीं पहुंच सकी। हमारी बटालियन ने तय किया कि हम उसे भी वापस हासिल करेंगे और हम वहां भी पहुंच गए। दुश्मन हैरान था और मैदान छोड़कर भागने को मजबूर हो गया।
भतीजियों की शादी करवाकर गए, जो कुछ दिया वह आज भी सहेज कर रखा
चूरू जिले के दूधवाखारा के सुमेरसिंह राठौड़ 13 जून को शहीद हुए थे। इससे महज सवा महीने पहले वे दो भतीजियों का विवाह करके गए थे। भतीजी सुमन बताती है कि शादी का पूरा काम उन्होंने संभाला। उन्होंने हमें बहुत से चीजें दिलवाई। उनमें से एक आलमारी उन्होंने खासतौर पर पसंद की जो आज भी रखी है। शहीद के पुत्र नरेंद्रसिंह बताते हैं कि उनकी बहन सविता, सुमन आज भी पिताजी के दिलाए उपहारों को देखकर रो पड़ती हैं। इसी दौरान उन्होंने झुंझुनूं के पिलानी के निकट झेरली गांव में अपनी बेटी की सगाई की थी और वादा किया था कि जल्द ही वापस लौटकर धूमधाम से शादी करेंगे।
पाक की सीमा में घुसे बिना ही चट्टानों पर चढ़े, पहली ही रात सात दुश्मनों को मार गिराया
यह कोई साधारण युद्ध नहीं था और इसकी कहानी भी साधारण नहीं हो सकती। घुप्प अंधेरे में भारतीय सैनिक बढ़े जा रहे थे। कहां खाई है और कहां चट्टानें। कुछ पता नहीं होता था। हमारी गढ़वाल राइफल की बटालियन उस वक्त असम के लेखापानी में तैनात थी। आदेश मिला की हमें तुरंत लेह पहुचाना है।
22 जून को हमारी बटालियन लेह पहुंच गई। इस तरह के मौसम से पहली बार सामना हो रहा था। सो हमें इसमें ढलने का सात दिन का समय दिया गया। हमें स्पष्ट आदेश था कि दुश्मन की जमीन पर पैर नहीं रखना है। मुश्किल यह थी कि बर्फीले पहाड़ों पर सीमाएं पहचानना ही कठिन था, लेकिन भारतीय जवानों ने पूरे जज्बे और हौंसले के साथ आगे बढ़ना जारी रखा। हमारे कंधों पर 50 किलो का साजो सामान था। रात का घोर अंधेरा और बर्फीली हवाएं हमारा रास्ते में बाधा बन रही थी।
दुश्मन ऊपर चोटी पर बैठा था और हम नीचे थे। यह सबसे बड़ी मुश्किल थी, क्योंकि उसके लिए हमें निशाना बनाना आसान था। इसलिए चढ़ाई के लिए हम लोग रात का समय ही चुनते और ज्यादा से ज्यादा रास्ता नाप लेते। रात के अंधेरे में हम दुश्मन की लोकेशन तक पहुंच गए। हमारा उनसे मुकाबला हुआ। पहली ही रात की लड़ाई में हमने दुश्मन के 7 जवानों को मार डाला। सुबह होते होते तो पाकिस्तानी सैनिक वहां से भाग निकले। यह हमारे लिए खुशी का ऐतिहासिक पल था।
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