जल संसाधन, नदी विकास व गंगा संरक्षण विभाग से मिल कर बने जलशक्ति मंत्रालय के केबिनेट मंत्री गजेंद्रसिंह शेखावत ने कोरोनाकाल के लॉकडाउन पीरियड के दो महीने में दो सौ से ज्यादा प्रोजेक्ट रिव्यू किए हैं। वे कहते हैं समय खूब था इसलिए वेबपोर्टल पर रोजाना आठ-दस मीटिंग कर लेते थे, 100% प्रोजेक्ट रिव्यू हो चुके हैं, अब उन पर काम आरंभ होने जा रहा है। केंद्रीय मंत्री शेखावत
से कोरोनाकाल में मंत्रालय व पार्टी के काम पर बातचीत-
Q लॉकडाउन के दिनों में मंत्रालय ने कितना काम किया?
शेखावत: प्रधानमंत्री ने लॉकडाउन शुरू होते ही कह दिया था, हमारे पास यही अवसर है माइक्रो सर्वे से एनालिसिस करने का। हमने घर-घर पानी पहुंचाने वाले जल जीवन मिशन, कृषि सिंचाई योजना की एआईबीपी, एक्युफर मैनेजमेंट, नेशनल हाइड्रोलोजी इंस्टीट्यूट, सीपीडब्ल्यूडी, नेशनल वाटर पॉलिसी व गंगा मिशन के एक-एक प्रोजेक्ट कर रिव्यू कर लिया।
Q यह काम कैसे व किस स्तर तक किया?
शेखावत: रोजाना एक-एक घंटे की 8 से 10 मीटिंग करते थे। जिसमें प्रत्येक राज्य के मंत्री, सचिव, चीफ इंजीनियर व दिल्ली के अफसरों तक वेबपोर्टल पर संवाद किया। प्रोजेक्ट टू प्रोजेक्ट पर साइड इंजीनियर तक को लूप में लेकर। जितनी भी डीपीआर बननी है, सभी का फाइनल करने की कार्ययोजना बना ली। इसके अलावा पेंडेमिक के दौर में आईआईटी व दूसरे फोरम व गंगा आंदोलन की पूरी फौज के साथ एकेडेमिक डिस्कस भी किया है।
Q यदि लॉकडाउन नहीं होता तो ये काम कितने समय में पूरे हो पाते?
शेखावत: मुझे लगता है कई सारे काम जो एक साल-पांच साल में एक बार भी नहीं कर पाते या फिर एक बार ही कर पाते, वे सभी लॉकडाउन के दो महीनों में हो गए। प्रदेशों की पार्टी कोर कमेटी की बैठक साल में 2 या 3 बार हो पाती थी, आप मानें कि कमेटी के अधिकांश सदस्य 60 दिन में 57 बार साथ बैठे हैं। जिला, मंडल, बूथ व हर मोर्चा स्तर पर कई बार संवाद किया है।
Q इस मैकेनिज्म से कितना समय व संसाधन बचा हैं, क्या आगे भी अभ्यास में रहेगा?
शेखावत: दिल्ली में एक फिजिकल मीटिंग का मतलब है, देश भर के अफसरों को बुलाया जाए। उनके आवास, भोजन और हवाई यात्राओं का खर्च तो होता ही था, दो-दो दिन उनका काम प्रभावित होता था। वेब पोर्टल पर काम करने का नया अवसर मिला है, अच्छा व उपयोगी निकला है इसके अभ्यास में लाएंगे।
Q जनता, कार्यकर्ता व अफसरों से रूबरू नहीं होने का असर पड़ेगा?
शेखावत: देखिए, व्यक्तिगत समीपता की ऊष्मा कभी समाप्त नहीं हो सकती। भावनात्मक संबंध को रिप्लेस नहीं किया जा सकता। परंतु टेक्नोलोजी के मार्फत मिलने की फ्रिक्वेंसी बढ़ाई जा सकती है। मेरा मानना है कि आगे सब देखेंगे कि चुनावी सभाएं, रैलियां व मीटिंग थ्रू वेब प्लेटफार्म पर होंगी जैसा कई देशों में होता है।
Q क्या भारतीय जनता वेब प्लेटफार्म की अभ्यस्थ हो सकेंगी?
शेखावत: क्यों नहीं। क्या पेंडेमिक से पहले सोचा था घर में बैठा रहना पड़ेगा। भारतीय परीपेक्ष्य में क्या सोचा था कि पढ़ाई जूम से होगी। सरकार ने 25 चैनल लांच किए हैं, गांव स्तर का बच्चा वेब व टीवी से पढ़ाई कर रहा है। परिवर्तन ऐसे ही तो आते हैं।
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