जयपुर के ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने वाले लोगों के लिए जरूरी खबर है। मंगलवार से ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने के लिए उन्हें कठिन परीक्षा देनी होगी। जगतपुरा आरटीओ ऑफिस में लाइसेंस के लिए ट्रायल ऑटोमेटेड ड्राइविंग ट्रैक पर कैमरों की निगरानी में होगी। गणित के 8 और अंग्रेजी के एच पर गाड़ी चला कर दिखाना होगा, तभी लाइसेंस मिलेगा। परिवहन विभाग प्रायोगिक तौर पर इसे शुरू कर रहा है। ट्रायल सफल रहने पर स्थाई रूप से निजी कंपनी को अनुमति दी जाएगी।
मंगलवार से ड्राइविंग लाइसेंस बनाने की प्रक्रिया में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। अब लोगों को ड्राइविंग ट्रैक पर ट्रायल देने के बाद लाइसेंस मानवीय निर्णय से नहीं, बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के आधार पर दिया जाएगा। जगतपुरा आरटीओ कार्यालय में दुपहिया और कार के ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने के ट्रायल ऑटोमेटेड ट्रैक पर ली जाएगी। यहां ट्रायल लेने का कार्य अब परिवहन निरीक्षक नहीं, बल्कि कैमरे करेंगे।
कैमरे ड्राइविंग ट्रायल दे रहे लाइसेंस आवेदक के वाहन चलाने के तरीके का विश्लेषण करेंगे और सॉफ्टवेयर उसी अनुरूप परिणाम जारी करेगा। कैमरा और सॉफ्टवेयर के मुताबिक यदि वाहन सही तरीके से चलाया तो लाइसेंस आवेदक को पास करार दिया जाएगा और यदि गलती हुई तो उसे फेल कर दिया जाएगा। परिवहन विभाग ने यह कार्य एक निजी कंपनी स्मार्टचिप टेक्नोलॉजीज को दिया है।
जयपुर के बाद प्रदेश में यही व्यवस्था लागू होगी
निजी कंपनी जयपुर के बाद अजमेर को छोड़कर प्रदेश के 10 अन्य आरटीओ कार्यालयों और झालावाड़ व डीडवाना डीटीओ कार्यालयों में भी ऑटोमेटेड ट्रैक पर ट्रायल कार्य शुरू करेगी। ऑटोमेटेड ट्रैक पर चार तरह की ट्रायल ली जाती है। एंगुलर पार्किंग, गणित के 8 के ट्रैक पर कार चलाने, अंग्रेजी के एच पर कार चलाने और रपट पर कार को रोककर दिखाने का टेस्ट देना होगा।
- पहली बार 7 मार्च 2019 को शुरू की गई ऑटोमेटेड ट्रैक पर ट्रायल।
- 16 लाइसेंस आवेदकों की ट्रायल ली, सभी हुए फेल, आवेदकों ने किया हंगामा।
- 3 दिन के प्रायोगिक ट्रायल के बाद मानी गई कम्पनी के सॉफ्टवेयर में खराबी।
- दूसरी बार 22 मई से स्मार्टचिप कंपनी ने ट्रायल शुरू किया।
- पहले दिन 10 में से 8 आवेदक फेल किए, दूसरे दिन 45 में से 36 फेल किए।
- 4 दिन ट्रायल के बाद फिर मानी गई साॅफ्टवेयर में खराबी।
- 2 बार तकनीकी खराबी पर भी विभाग ने नहीं बदली कंपनी।
- अब तीसरी बार शुरू किया जा रहा ड्राइविंग ट्रैक पर ट्रायल
- आरएसआरडीसी ने परिवहन विभाग के बजट से बनाया ट्रैक।
- भूमि विभाग की, इन्फ्रास्ट्रक्चर भी तैयार करके दिया।
- ट्रायल लेने वाली स्मार्टचिप कंपनी ने ट्रैक पर सिर्फ कैमरे, कम्प्यूटर और कर्मचारी लगाए हैं।
ऑटोमेटेड ड्राइविंग ट्रैक पर सवाल और विरोध इसीलिए
- विशेषज्ञों के मुताबिक ट्रैक पर कंपनी का बमुश्किल 80 लाख रुपए का खर्चा हुआ
- कंपनी प्रति आवेदक 235 रुपए का शुल्क लेगी, विभाग को कुछ नहीं
- 200 लाइसेंस रोज बने तो कंपनी को सालभर में 1.25 करोड़ की आय होगी। कई बार लाइसेंस 250 से 300 तक भी बनते हैं
- कंपनी 6 से 8 माह में लागत वसूल कर लेगी, फिर जेबें भरेगी।
- आवेदकों पर लाइसेंस का 235 रुपए का नया बोझ बढ़ेगा
विभाग- पारदर्शिता रहेगी ड्राइविंग स्कूल- दलाल स्कीम
परिवहन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि ड्राइविंग लाइसेंस बनाने में ऑटोमेटेड ट्रैक पर कैमरों के जरिए ट्रायल लेने से प्रक्रिया पारदर्शी होगी। नई प्रक्रिया में परिवहन विभाग के निरीक्षकों का दखल नहीं रहेगा। लाइसेंस जारी करने का कार्य सॉफ्टवेयर पर निर्भर होगा। ऐसे में यह आशंका जताई जा रही है कि निजी कंपनी के लोग सॉफ्टवेयर से छेड़छाड़ कर अपनी मर्जी से खास लोगों को लाइसेंस जारी करेंगे। जनमोर्चा मोटर ड्राइविंग स्कूल एसोसिएशन इसे दलाल स्कीम बता रहे हैं। कहते हैं कि इस सिस्टम से आरटीओ कार्यालय में निजी कम्पनी के जरिए दलालों को बढ़ावा मिलेगा। परिवहन आयुक्त को ज्ञापन भी सौंपा है। आपत्तियों के बीच विभाग ने अब तय कर लिया है कि मंगलवार से ड्राइविंग ट्रायल लेने का कार्य ऑटोमेटेड ट्रैक पर होगा।
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