(प्रमोद कल्याण) चिट्ठियां... प्यार, मिलन, विरह और दर्द के संदेशों से लबरेज निशानियां होती हैं जो पढ़ने वालों को सदैव संतोष देने के साथ ही प्रेरित भी करती हैं। भरतपुर जिले के दो करगिल शहीदों के लिखे खतों को उनकी वीरांगनाओं ने आज भी आखिरी निशानी के तौर पर संभाल कर रखा हुआ है। कहती हैं कि इन्हें पढ़कर आज भी आंखें नम हो जाती हैं और पूरा दृश्य किसी फिल्म की भांति जेहन में छा जाता है।
भला वे भी क्या लोग थे, जिन्होंने इन खतों में न केवल अपने परिवार को बल्कि देश और समाज को भी संदेश दिया। इसे विडंबना ही कहेंगे कि शहीद वीरेंद्र सिंह ने जो खत लिखा, उसे वे डाक में भी नहीं डाल पाए। बाद में यह खत उनके पार्थिव शरीर के साथ बक्से में आया। उनकी वीरांगना गायत्री देवी ने भी साहस का परिचय देकर पति की अर्थी को कंधा दिया जो देशभर में अन्य वीरांगनाओं के लिए मिसाल बन गया। करगिल विजय दिवस के मौके पर आज पढ़िए शहीदों की आखिरी निशानियों से जुड़ी भावनात्मक बातें।
शहीद वीरेंद्रसिंह
11 राजपूताना राइफल के जवान वीरेंद्रसिंह तुरतुक सेक्टर में तैनात थे। उन्हें पत्र लिखने का शौक नहीं था। वे जनवरी में ही छुट्टी बिताकर ड्यूटी पर गए थे। लेकिन, 25 जून को गोला-बारूद लोड करते समय पाकिस्तानी सोल्जर्स ने बम फेंका। जिसका स्पलेंडर पेट में लगने से वे शहीद हो गए। दो दिन बाद 27 जून को उनका शव आया, जिसके साथ बक्से में एक खत भी था।
यह खत उन्होंने भतीजे ब्रजेश को संबोधित करके 17 मई,1999 को लिखा था, लेकिन वे उसे पोस्ट नहीं कर पाए। ब्रजेश सिंह कहते हैं कि इस खत में उन्होंने मोटिवेट करने वाली बातें लिखी थीं। पत्र में उन्होंने कहा कि बेटे आप खूब शान-शौकत से रहते सकते हो, लेकिन अपना कर्म ठीक से करना। मेहनत का फल हमेशा मीठा होता है। अभी आप कष्ट उठा लोगे तो आगे आपको बहुत आराम मिलेगा। शायद यह उनकी अंतर आत्मा का वार्तालाप था कि उनका पत्र आज भी हमारे परिवार को प्रेरणा देता है।
हवलदार भगवानसिंह
17 जाट रेजिमेंट में हवलदार भगवानसिंह की रिटायमेंट फाइल पेंडिंग थी। लेकिन, युद्ध शुरू होने के कारण उन्होंने कागज नहीं भेजे और मास्को वैली पर कब्जे के लिए कूच कर गए। ग्रेनेड के हमले में वे 7 जुलाई,1999 को शहीद हो गए। उन्होंने युद्ध के मैदान से 17 जून को अपनी मां और अन्य परिजनों के नाम पत्र लिखे। दुर्योग से ये पत्र उनकी शहादत के दो माह बाद डाक से आए। इनमें से एक पत्र में उन्होंने बड़ी बेटी कृष्णा को लिखा कि तुझे घर के काम आना है।
मैं देश के काम आउंगा। उनके पुत्र अनिल कुमार कहते हैं कि पिताजी के पहले के पत्रों में कभी भी जय हिंद नहीं लिखा होता था, लेकिन इस चिट्टी में शुरू और अंत में जय हिंद लिखा। साथ ही लिखा कि टीवी/रेडियो पर लड़ाई की खबरों में ध्यान नहीं देना। मैं कुशल हूं। अब शायद चिट्टी नहीं लिख पाऊंगा। उन्होंने घर आने का वादा किया, लेकिन उससे पहले उनके शहादत की खबर आई।
शहादत से पहले लिखे कुछ खत पहुंचे और कुछ पहुंचे ही नहींः कैप्टन सिंह
सन 1998 से 2000 तक करगिल के काकसर क्षेत्र में तैनात रहे कैप्टन लेखराजसिंह कहते हैं कि वर्ष 1999 में पाकिस्तानी सैनिकों ने धोखा देकर पोस्टों पर कब्जा कर लिया था। उस समय युद्ध अभियान पर गए सैनिकों के सामने जब मरो और मारो की परिस्थितियां उत्पन्न हुई तो अधिकारियों ने कहा कि घर वालों के लिए अगर कोई मैसेज हो तो लिख दीजिए। इसलिए कई सैनिकों ने भावनात्मक चिट्ठियां परिजनों को लिखीं। कई पहुंच पाईं और कई चिट्ठियां पहुंच ही नहीं पाईं। क्योंकि इनमें घर-परिवार के लिए चिंता और अप्रत्यक्ष रूप से युद्ध की संभावनाओं का जिक्र है।
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