पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट सहित उनके गुट के कांग्रेस के बागी 19 एमएल को दिए गए अयोग्यता नोटिस विवाद मामले में हाईकोर्ट के स्पीकर नोटिस पर यथास्थिति के आदेश के बाद अब कानूनविदों का मानना है कि स्पीकर को नए सिरे से हाईकोर्ट के इस अंतरिम आदेश को चुनौती देनी चाहिए।
हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश पानाचंद जैन का मानना है कि स्पीकर को हाईकोर्ट के 24 जुलाई को दिए गए अंतरिम फैसले को या तो नई एसएलपी के जरिए सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देनी चाहिए या फिर उनकी लंबित मौजूदा एसएलपी में हाईकोर्ट के नए अंतरिम फैसले का हवाला देते हुए संशोधन करवाना चाहिए। ऐसे में जब सोमवार को सुप्रीम कोर्ट मामले में स्पीकर की एसएलपी पर सुनवाई करेगा तो हो सकता है कि वह स्पीकर को मौजूदा एसएलपी पर संशोधन करने के लिए कहें।
विधानसभा सत्र बुलाना भी आ सकता है अवमानना के दायरे में
जस्टिस जैन का मानना है कि हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश व सुप्रीम कोर्ट में स्पीकर की एसएलपी लंबित रहते हुए विधानसभा का सत्र बुलाया जाना भी प्रारंभिक तौर पर अदालत की अवमानना के दायरे में आ सकता है। वहीं हाईकोर्ट के सीनियर एडवोकेट हनुमान चौधरी का कहना है कि जब तक मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है तब तक स्पीकर व राज्यपाल भी अदालत के अंतरिम निर्णय से पाबंद हैं।
ऐसे में स्पीकर व राज्यपाल को सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट के फैसलों का इंतजार करना चाहिए। जबकि हाईकोर्ट के अधिवक्ता एनसी गोयल का भी मानना है कि स्पीकर का क्षेत्राधिकार केवल विधानसभा के अंदर का है, ऐसे में वे विधानसभा सदस्यों के बाहर की गतिविधियों पर कार्रवाई नहीं कर सकते।
वहीं हाईकोर्ट के अधिवक्ता प्रेमंचद देवंदा का कहना है कि मौजूदा हालात में स्पीकर द्वारा पुरानी एसएलपी में ही हाईकोर्ट के नए यथास्थिति आदेश का हवाला देकर सर्वोच्च अदालत से एसएलपी में संशोधन करने का आग्रह करना चाहिए। जिससे कि हाईकाेर्ट के यथास्थिति आदेश को भी चुनौती दी जा सके।
हाईकोर्ट में दिलावर की याचिका कल सुनी जाएगी
बीजेपी एमएलए मदन दिलावर द्वारा बसपा के छह एमएलए के कांग्रेस में विलय के खिलाफ स्पीकर के समक्ष दायर उनकी शिकायत याचिका में कार्रवाई नहीं होने को चुनौती देने के मामले में भी हाईकोर्ट में सोमवार को ही सुनवाई होगी। पायलट गुट व स्पीकर विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पिछली सुनवाई पर स्पीकर को हाईकोर्ट के फैसले पर जहां रोक लगाने से इंकार कर दिया था।
वहीं हाईकोर्ट ने शुक्रवार को दिए गए अंतरिम आदेश में पायलट गुट के 19 एमएलए को स्पीकर द्वारा 14 जुलाई को दिए अयोग्यता नोटिस की क्रियांविति पर रोक लगा दी थी। पायलट गुट के अधिवक्ता दिव्येश माहेश्वरी ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट में उन्होंने भी केविएट दायर की हुई है और सर्वोच्च अदालत एसएलपी में कोई भी आदेश देने से पहले उनका भी पक्ष सुनेगी। हाईकोर्ट ने भी इस मामले में सचिन पायलट के तीन बिन्दुओं को सुनवाई के लिए मंजूर करते हुए 13 अन्य बिन्दुओं को सुनवाई के लिए तय किया है।
न्याियक अनुशासनहीनता इन दिनों बढ़ती ही जा रही है...
न्यायिक दृष्टांतों को लागू करने का एक अलग अनुशासन होता है। हाईकोर्ट की खण्डपीठ के निर्णय से एकल पीठ बाध्य होती है। इसी प्रकार सुप्रीमकोर्ट का निर्णय, हाईकोर्ट पर बाध्यकारी होता है। सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायाधीशों की संवैधानिक बेंच के निर्णय में दिए गए निर्देशों की उपेक्षा, न्यायिक-अनुशासनहीनता की परिभाषा में आती है। यह न्यायिक-अनुशासनहीनता इन दिनों हर तरफ देखने को मिल रही है। ऐसा लगता है- जैसे सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ के निर्णयों की बाध्यता को हर क्षेत्र में इग्नोर किया जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने 1992 मे किहोतो होल्लोहान के प्रकरण में संविधान की दसवीं अनुसूची का पेरा 2(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं करता। संवैधानिक पीठ ने विधायक द्वारा ‘स्वेच्छा से सदस्यता त्यागने’ का विवेचन करते हुए दसवीं सूची को वैध माना था। इसी प्रकार सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने नबर रेबिया (अरुणाचल प्रदेश) के प्रकरण में संविधान के अनुच्छेद 163 (1) तथा अनुच्छेद 174 का विवेचन करते हुए अवधारित किया है।
यदि राज्य सरकार का मंत्रिमंडल विधानसभा का सत्र आहूत करने का प्रस्ताव राज्यपाल को भेजता है तो राज्यपाल उस प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिए बाध्य है। लेकिन सुप्रीमकोर्ट के इस निर्णय की भी अनुपालना नही की जा रही है न्यायिक-अनुशासनहीनता के ऐसे प्रकरणों में सुप्रीम कोर्ट को ही कोई कदम उठाना चाहिए।
- जस्टिस शिव कुमार शर्मा
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