(दीपक आनंद) अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रिसर्च में तेजी से पिछड़ रहे भारतीय छात्रों के लिए अच्छी खबर यह है कि नेशनल एजुकेशन पॉलिसी में नेशनल रिसर्च फाउंडेशन के प्रावधान से उन्हें मदद मिलेगी। इससे देश के युवाओं का रिसर्च में रुझान बढ़ेगा। उन्हें नेशनल प्लेटफाॅर्म मिलेगा। इंडियन इकोनॉमिक सर्वे के अनुसार भारत की प्रति दो लाख की आबादी पर मात्र 15 रिसर्चर हैं, जबकि चीन में 111, यूएसए में 423 व इजराइल में 825 रिसर्चर हैं। हालांकि स्टार्टअप को एनईपी में शामिल नहीं किया गया है।
कुछ समय पहले एमएचआरडी ने नेशनल इनोवेशन एंड स्टार्टअप पॉलिसी शुरू की थी। इसमें छात्र की न्यूनतम उपस्थिति पर परीक्षा में बैठने और स्टार्टअप के दौरान सेमेस्टर व ईयरली ब्रेक का भी प्रावधान किया गया था। प्रदेश की यूनिवर्सिटीज भी रिसर्च के कारण एनआईआरएफ रैंकिंग में पिछड़ रही हैं। यहां तक कि कुछ यूनिवर्सिटीज में रिसर्च बिल्कुल भी नहीं हो रही है। फैकल्टी की कमी के कारण अमूमन हर यूनिवर्सिटी रिसर्च गाइड की कमी से जूझ रही है।
फिलहाल नई पॉलिसी में आईपीआर और पेटेंट शामिल नहीं
आईपीआर विशेषज्ञ डॉ. परेश दवे ने बताया कि रिसर्च के बाद आने वाले रिजल्ट से जुड़े आईपीआर व पेटेंट को एनईपी में शामिल नहीं किया है। अब भारत में विदेशी यूनिवर्सिटी को खोलने की इजाजत मिल गई है। ऐसे में भारतीय रिसर्चर के अनुसंधान का पेटेंट विदेशी यूनिवर्सिटी करवाकर मुनाफा हासिल करेंगी।
पेटेंट फाइलिंग चीन से पीछे भारत
प्रतिवर्ष चाइना व अमेरिका में 11 से 13 लाख पेटेंट फाइल किए जाते हैं। भारत में इसकी संख्या मात्र 50 हजार है, जो कि काफी कम है। विशेषज्ञों के अनुसार आईपीआर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनुसंधान, आविष्कार के उपयोग व प्रैक्टिस व लाइसेंस नीति पर जोर देता है।
आरएंडडी पर भी करना होगा फोकस
यूरोप में आर्थिक विकास का दो तिहाई हिस्सा रिसर्च एंड डेवलपमेंट से मिलता है। प्रत्येक देश आरएंडडी में कम से कम दो से पांच प्रतिशत निवेश करता है। साल 2008 से लेकर 2014 तक भारत में आरएंडडी निवेश नहीं बढ़ा। शिक्षा नीति से इसको भी बढ़ाया जा सकता है।
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