अभी शादी-सावों के दिन हैं। हिंदू विवाह संस्कार से जुड़ी रस्मों की शुरुआत में ही बहुत अजीब और अशुभ बदलाव देखा गया है। महंत-आचार्यों ने ऐसा देखा तो उन्हें अखरा, उन्होंने सावचेत किया है। वधू के घर वर के प्रवेश पर होने वाली तोरण रस्म के दौरान गणेशजी को तलवार मारना अज्ञानता है। तोरण की रस्म युगों पुरानी है। पौराणिक प्रसंगों-किवदंतियों में तोरण राक्षस का प्रतीक है, इसका वध करने के उपरांत ही वर वधू तक पहुंंच पाता है। मगर अब बाजार में ऐसी तोरण बंधनवार है, जिस पर गणेश हैं। गणेश को तलवार ना मारें, तोरण तोता स्वरूप ही होता है।
तोरण नामक राक्षस तोते के रूप में वधू के घर के द्वार पर बैठ जाता था। दूल्हे के आते ही उसके शरीर में प्रवेश कर युवती से खुद विवाह कर लेता था। एक राजकुमार को यह पता चला तो उसने विवाह स्थल के द्वार पर बैठे तोते का वध कर दिया। यहीं से तोरण की रस्म समाज में शुरू हुई। -प्रचलित मान्यता
प्रथम पूज्य के सेवादार बता रहे हैं- हम तोरण में कैसे गणपति का तिरस्कार कर रहे हैं
शिव-पार्वती विवाह प्रसंग से समझें...
शिव-पार्वती विवाह के समय तोरण और पर्वत नाम के दो असुर बाधक बने। शिव बारात लेकर पहुंचे तो तोरण का वध किया। पर्वत को वरदान था कि पुरुष के हाथों नहीं मरेगा, उसका वध पार्वती ने किया। द्वार पर दूल्हे द्वारा तोरण और फेरों के दौरान वधू द्वारा पत्थर पर पैर रखकर तीन फेरे लेने की रस्म तभी शुरू हुई।
-पं. मोहनलाल शर्मा, सूरजपोल स्थित श्री श्वेत सिद्धि विनायक मंदिर के कार्यवाहक प्रन्यांसी
श्रीकृष्ण के बारात प्रसंग को याद रखें...
नारद मुनि के कहने पर गणेशजी को श्रीकृष्ण अपनी बारात में नहीं ले गए। गणेशजी का बुरा लगा। उन्होंने मूषक भेजकर बारात का मार्ग खुदवा दिया। बारात रास्ते में फंस गई। कृष्ण ने गलती मानी, क्षमा-याचना की। कृष्ण से पहले गणेशजी का रिद्धि-सिद्धि से विवाह हुआ तब कृष्ण की शादी हो पाई। विवाह संस्कार में प्रथम पूज्य का आपमान नहीं करें, ताकि वे विघ्नहर्ता से विघ्नकर्ता न बनें।
-महंत जय शर्मा, ब्रह्मपुरी स्थित नहर के गणेशजी
(यतीश शर्मा की सोशल रिपोर्ट)
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