नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क स्थित ‘रेस्क्यू सेंटर’ की शेरनी ‘बेगम’ ने सोमवार को अलविदा कह दिया। बेगम रेस्क्यू सेंटर की आखिरी मेहमान थी। मेहमान इसलिए कि रेस्क्यू सेंटर बना ही बेगम जैसे दूसरे शेर-बाघों के लिए था, जिनको कभी सर्कस में काम लिया जाता था। आखिरकार कोर्ट के आदेश पर 2002 में बायोलॉजिकल पार्क बनने से पहले नाहरगढ़ सेंचुरी में इनके लिए अलग से सेंटर बनाया गया।
इसके बाद यहां देशभर के सर्कस से छुड़ाए गए शेर-बाघों को लाकर रखा गया। सेंटर में एक साथ 50 शेर-बाघों के लिए पिंजरे बनाए गए थे। कभी पूरे भरे भी थे। वहीं यहां लाए कुल जानवरों की संख्या 68 तक पहुंची। बेगम को नटराज सर्कस, झारखंड से 2005 में लाया गया था। 40 शेर और 28 बाघ में एक मिक्स ब्रीड टायगॉन भी। एम्पायर सर्कस, बॉम्बे से 8 लायन और 10 टाइगर और 1 टायगॉन। इसके अलावा एमपी, यूपी, झारखंड आदि जगहों के सर्कस से।
सबसे उम्रदराज 30 की बेगम!
सर्कस में कई जानवरों का तो रिकॉर्ड ही मैटेंन नहीं था। बेगम की उम्र लाते समय 15 साल बताई गई थी। इस लिहाज से मौत तक उम्र 30 पहुंच गई, जो कि कैट फेमिली के इस जानवर के लिए दुर्लभ है। एसीएफ जगदीश गुप्ता के मुताबिक हम केवल उनके रिकॉर्ड पर ही निर्भर थे। संभव है रिकॉर्ड में कुछ गफलत रही हो।
अब रेस्क्यू सेंटर का क्या ?
सर्कस के जानवरों को प्राकृतिक जीवन देने के उद्देश्य से रेस्क् यू1 अगस्त 2002 को जमुना सर्कस, बिहार से लायन का जोड़ा आया था। सबसे आखिर 2009 में मुजफ्फरपुर नगर के फार्म हाउस से शेर नरसिम्हा लेकर आए। एसीएफ जगदीश गुप्ता के मुताबिक जैसे-जैसे सर्कस के शेर-बाघ मरते गए तो इनके पिंजरों में दूसरी जगह से रेस्क्यू कर लाए गए 6 लेपर्ड, 4 हायना को रखा जा रहा है। इसके साथ सेंट्रल जू अथॉरिटी से मंजूरी लेकर 4 पेयर वूल्फ हैं, जिनके लिए ब्रिडिंग सेंटर का भी उपयोग। अब दूसरे जानवरों लायक थोड़े बदलाव भी करेंगे।
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