आज विश्व पर्यावरण दिवस है। प्रकृति को संवारने का संकल्प लेने का दिन। प्रकृति का संरक्षण हमारी जिम्मेदारी है, लेकिन पिछले कुछ दशकों के दौरान हमने लालच में प्रकृति को भारी नुकसान पहुंचाया। हालात ऐसे हो गए हैं कि उजड़ते जंगल, रीतता पानी और सूखती धरा नजर आती है। हालांकि कुछ लोग ऐसे भी हैं जो प्रकृति को बचाने में जुटे हैं। सिलीसेढ़ झील की तलहटी से मिट्टी निकालने में जुटी जेसीबी व ट्रैक्टरों के बीच खड़ा यह शख्स कोई सरकारी अधिकारी नहीं बल्कि अलवर के सर्जन डॉ.विजय पाल सिंह यादव हैं। डॉ. यादव ने अपने बूते प्रकृति की सेहत को सुधारने का संकल्प लिया है। वे पिछले पांच दिन से सिलीसेढ़ झील में भूमिगत पानी के जलस्तर को सुधारने के लिए वहां सिल्ट (अपशिष्ट) हटाने में जुटे हैं। इस काम के लिए उन्होंने 2 जेसीबी व 17 ट्रैक्टर लगाए हैं, जिससे मानसून से पहले मिट्टी निकल जाए और बारिश आने पर ग्राउंड वाटर रिचार्ज हो सके।

ढाई हजार पौधे लगाए
सेना में सिपाही के पद पर भर्ती होने के बाद उच्च शिक्षा प्राप्त कर सर्जन बने डॉ. यादव का जज्बा धरा के लिए कुछ कर गुजरने का है, तभी तो उन्होंने शहर और आसपास के इलाके में करीब ढाई हजार पौधे भी लगाए हैं। जुनून ऐसा है कि लॉकडाउन के दौरान भी रोज सवेरे साइकिल पर सवार होकर वे एक-एक पौधे, जिनमें से कई पेड़ बन चुके हैं, उन्हें देखने के लिए जाते हैं। विश्व पर्यावरण दिवस पर उनके जज्बे को सलाम। डॉ.विजयपाल का कहना है कि अलवर जिले में बांध और झीलों में पानी तो दिखाई देता है, लेकिन वह जमीन में सिल्ट के कारण रीचार्ज नहीं होता। ज्यादातर पानी भाप बनकर उड़ जाता है। अगर सिल्ट को हटा दिया जाए तो पानी जमीन में जाएगा। सिलीसेढ़ झील में ही मानसून में इतना पानी आता है कि सही तरह से रीचार्ज होकर जमीन में चला जाए को 10 किलोमीटर के एरिया में पानी का जल स्तर बढ़ जाएगा। उन्होंने सिलीसेढ़ में 31 मई से मिट्टी निकालने का काम शुरू किया है। इस काम में 17 ट्रैक्टर व 2 जेसीबी लगाई हैं जो दिन रात चल रही हैं। इस काम में ग्रामीणों का पूरा सहयोग मिल रहा है। पास की गांव के रहने वाले लालाराम तो मिट्टी निकालने में लगे लोगों को खाना खिला रहे हैं।

किसान परिवार में पैदा हुए, सेना में सिपाही से बने सर्जन

किसान परिवार में पैदा हुए रामगढ़ के खिलौरा गांव के रहने वाले डॉ.विजयपाल यादव साढ़े सत्रह साल की उम्र में सेना में सिपाही के पद पर भर्ती हुए। सेना में रहते हुए 12वीं की परीक्षा पास की और 1993 में पीएमटी की। कोटा मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस करने के बाद जयपुर के एसएमएस मेडिकल कॉलेज से एमएस किया।
मुहिम से जुड़े डॉक्टर साथियों ने डोनेट किए ट्री गार्ड
उन्होंने 10 साल सरकारी नौकरी की। अलवर के राजीव गांधी सामान्य चिकित्सालय में नवंबर 2009 में सरकारी नौकरी से त्याग पत्र देकर खुद का निजी अस्पताल खोल लिया। उनके दो बेटे हैं और दोनों डॉक्टर हैं।

डॉॅ. यादव का कहना है कि पौधे लगाने की मुहिम में अब उनके साथ कई लोग जुड़ने लगे हैं। कई डॉक्टर साथी इस मुहिम में शामिल हो गए हैं। वे कॉलोनियों में पौधे लगाने के लिए ट्री गार्ड डोनेट कर देते हैं। बहुत से साथी डॉक्टरों ने उन्हें ट्री गार्ड दिए हैं। कई तो कॉलोनियों में लगाए पौधों की देखभाल व उनमें पानी देने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। यही कारण है कि लगाए गए ज्यादातर पौधे जीवित हैं।

शुरू में ग्रामीणों ने किया विरोध, अब साथ आ गए
डॉ.यादव बताते हैं कि वे सिलीसेढ़ झील की सफाई के लिए जब जेसीबी लेकर गए तो कुछ ग्रामीणों ने विरोध किया। एक महिला तो जेसीबी के सामने आ गई। उन्हें समझाया कि मिट्टी हटने से पानी रिचार्ज होगा तो सब को पीने का पानी मिलेगा। उनके कुआं और बाेरिंगों में पानी का लेबल बढ़ जाएगा। ग्रामीणों की बात समझ में आई तो वे खुद इस मुहिम का आज हिस्सा बन गए हैं। कई लोग तो खुद अपने ट्रैक्टर लगाकर मिट्टी ले जा रहे है। झील की उपरी परत की उपजाऊ मिट्टी है। इसे किसान अपने खेतों में डाल रहे हैं। यह मिट्टी जैविक खाद का काम करेगी। पौधे लगाने एवं जोहड़ों की सफाई करने में डॉ.विजय पास सिंह यादव का परिवार और अस्पताल का स्टाफ पूरी मदद करता है। खेती का काम करने वाले छोटे भाई ओमप्रकाश यादव खुद ट्रैक्टर और ड्रिल मशीन से पौधे लगाते हैं।



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अलवर. सिलीसेढ झील की तलहटी से मिट्टी निकालते जेसीबी व ट्रैक्टर ट्राॅलियां।
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