कोरोना वायरस और देशभर में मौसम का बदलता मिजाज हमें संकेत दे रहे हैं कि संभल जाओ, वर्ना हालात अत्यंत विकट हाेंगे।ये घटनाएं हमें पर्यावरण के प्रति सजग होने का संदेश दे रही हैं। पर्यावरण से गैर जरूरी छेड़छाड़ की आदत नहीं बदली तो प्रकृति कितना रौद्र रूप दिखाएगी इसकी कल्पना करना भी मुश्किल हाेगा।
शुक्रवार को विश्व पर्यावरण दिवस है। शहर में विभिन्न संगठनों की ओर से पर्यावरण संरक्षण को लेकर कार्यक्रम किए जा रहे हैं। राजकीय पटेल उच्च माध्यमिक विद्यालय के प्राध्यापक गुरुशरण गोयल ने बताया कि धरती पर पिछले कुछ सालों में भूकंप, बाढ़, सुनामी जैसी घटनाएं तेजी से बढ़ीं हैं। प्रकृति की इन आपदाओं में जान-माल का खूब नुकसान होता है। धरती के ईको-सिस्टम में आए बदलावों और तेजी से बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग के कारण ही यह सब हो रहा है।
वैज्ञानिकों ने इन आपदाओं के लिए हमारे प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध इस्तेमाल को जिम्मेदार ठहराया है। यही हाल रहा तो 2030 तक हमें रहने के लिए दूसरे ग्रह की जरूरत होगी।
विलायती बबूल को हटाने की चल रही मांग
उपखंड के वन्य क्षेत्र से विलायती बबूल को हटाए जाने की मांग लंबे समय से चल रही है। गोयल ने बताया की ब्यावर के आसपास स्थित पहाड़ियों में हाेने वाला खनन पर्यावरण व वन्य जीवों के लिए खतरा है। अरावली की पहाड़ियों में फैले वन्य क्षेत्र को विलायती बबूल धीरे-धीरे खत्म कर रहा है। यह पहाड़ियों के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भी फैल चुका है। अरावली पर पाई जाने वाली अमूल्य वन व वानस्पतिक संपदा को बबूल निगलता जा रहा है। वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक सही समय पर अगर लगातार विलायती बबूल को रोका नहीं गया तो भविष्य में पेड़-पौधों की रही सही प्रजातियां भी खत्म हो जाएंगी। पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करने वाली कुछ संस्थाओं की ओर से किए सर्वे के मुताबिक विलायती बबूल देशी जानवरों और पौधों पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है, जिसके चलते जैव विविधता कम हो गई। वन विभाग ने अब प्रयास तेज किए हैं। बबूल के स्थान पर कम पानी में उगने वाले बिल्व पत्र, लसोड़ा, खेजड़ी, कुमटा, गूंदी, इमली, जामुन, बांस, एलोवेरा जैसे फलदार पौधे लगाए जाएंगे।
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