(प्रवीण शर्मा)हर सोमवार हम शून्य से शिखर का सफर तय करने वाले लोगों की कहानियां पढ़ते हैं। संघर्ष को अपनी ताकत बनाते हुए कुछ लोग जीवन की राह में इतनी मजबूती के साथ खड़े रहते हैं कि बाधाएं खुद-बखुद अपना रास्ता मोड लेती हैं। आज की कहानी एक ऐसेे ही शख्सियत की है जिन्होंने कठिन परिश्रम और दूरदर्शिता से बड़ा मुकाम हासिल किया।

साधारण एसटीडी बूथ से कामयाब उद्यमी बनने तक का सफर तय करने वाले अजीत खटाणा की कहानी सच में कामयाबी की अनूठी मिसाल है। शुरुआत से जुझारु प्रवृत्ति के रहे अजीत ने संघर्षों के सामने कभी अपने को झुकने नहीं दिया। हरियाणा में सोहना के अभयपुरा गांव में जन्में अजीत पढ़ाई में अव्वल रहे।

केमिकल इंजीनियरिंग में पढ़ाई के बाद अजीत भिवाड़ी आ गए। यहां वह एक कंपनी में काम करने लगे। अभी काम करते हुए कुछ ही दिन हुए थे कि उन्हें नौकरी से हटा दिया गया। किसी तरह जुगाड़ कर दूसरी नौकरी हासिल कर ली। वहां भी कुछ दिनों बाद उन्हें नौकरी से हाथ धोना पड़ा। ऐसे में अजीत को दो साल में लगातार 5 जगह नौकरी बदलनी पड़ी।

बार-बार नौकरी बदलने से अजीत ऊब चुके थे। मन में सोचा कि अब चाहे कुछ भी हो, नौकरी नहीं करूंगा। लेकिन इतना पैसा नहीं था कि खुद का व्यपार कर सकें। ऐसे में अजीत ने एक एसडीटी बूथ शुरु कर दिया। इससे होने वाली कमाई भले ही थोड़ी हो लेकिन अजीत को सुकून था। यह उसके खुद के व्यापार से अर्जित की हुई थी। थोड़े समय तक यह काम करने के बाद अब अजीत ने जीवन की गाड़ी को आगे बढ़ाने का फैसला लिया।

चीन ने दिखाई आंख तो बदल दिए कंपनी के ऑर्डर
अजीत की मानें तो भारत का प्लास्टिक बाजार पूरी तरह चीन पर निर्भर है। हमें इस दिशा में आत्मनिर्भर बनने में बहुत समय लगेगा। हालांकि पिछले दिनों चीन से तनातनी के बाद भारत ने चीन से आने वाले प्लास्टिक के कई उत्पादों पर 30 से 50 फीसदी तक ड्यूटी बढ़ाई है।

भारत में हैल्मेट बनाने वाली कंपनियां अपना वाइजर हमारे यहां तैयार नहीं कर सकती। उन्हें चीन पर निर्भर होना ही पड़ता है। लेकिन अब भारत की कंपनियां भी समझ चुकी हैं। अब भारत में ही इस दिशा में काम हो रहा है। वहीं अब यह वाइजर चीन की जगह वियतनाम और ताइवान से मंगाए जा रहे हैं। उन्होंंने खुद की कंपनी द्वारा चीन को दिया 90 लाख रुपए का आर्डर कैंसिल कर वियतनाम को दिया है।

चार कैन खरीदकर कंपनी की शुरुआत की
अजीत ने वर्ष 2002 में चार हजार रुपए में केमिकल के चार कैन खरीदे। यहीं से उसने अपना दूसरा काम शुरु कर दिया। अब वह केमिकल को भिवाड़ी की कंपनियों में सप्लाई करने लगा। धीरे-धीरे बड़ी कंपनियां उससे जुड़ने लगी। उसका केमिकल हीरो, जैक्वायर, रोका जैसी बड़ी कंपनियों में जाने लगा। इस कंपनी का नाम स्टार केमिकल रखा।

धीरे-धीरे कंपनी का माल देश के अन्य हिस्सों में भेजना शुुरु कर दिया। जब कंपनी ने रफ्तार पकड़ी तो अजीत ने अपने दोस्तों की सलाह पर वर्ष 2013 में प्लास्टिक के उत्पाद बनाने वाली स्टार लाइट मोल्डिंग प्रोडक्ट प्रा. लिमिटेड कंपनी डाल दी। आज इस कंपनी में टब, डिब्बा, हैलमेट, चेयर, स्टूल आदि बनते हैं।

इस कंपनी से हैलमेट बनाने वाली बड़ी कंपनियों को भी माल जाता है। आज अजीत की दोनों कंपनियों में 200 लोग काम करते हैं। उनका सालाना टर्न ओवर भी 12 करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है।



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