संजीवनी क्रेडिट को-ऑपरेटिव सोसायटी धोखाधड़ी मामले में जयपुर मेट्रो के एडीजे-8 कोर्ट से जिस याचिका में केंद्रीय मंत्री गजेंद्रसिंह शेखावत के लिंक की जांच के आदेश दिए गए हैं, उसमें जोधपुर में संजीवनी के विक्रम सिंह और शेखावत के बीच सांसद बनने से पहले के लिंक का भी हवाला है।
जोधपुर के पावटा में जिस जमीन पर विक्रम सिंह की संजीवनी आनंदा बिल्डिंग खड़ी की गई, उसकी लीज डीड कंपनी के डायरेक्टर की हैसियत से गजेंद्रसिंह शेखावत काे ही जारी की गई थी। भास्कर ने जुटाए दस्तावेजों से पता चला है कि दोनों ही अरिहंत थिएटर प्राइवेट लिमिटेड में डायरेक्टर थे और सांसद का चुनाव लड़ने से पहले यह पार्टनरशिप खत्म कर दी गई थी। हालांकि सांसद बनने के बाद भी शेखावत को उनकी हिस्सेदारी के लाखों रुपए का भुगतान होता रहा था।
दरअसल, वर्ष 2008 में जब विक्रम सिंह ने संजीवनी क्रेडिट काे-ऑपरेटिव सोसायटी खड़ी की थी, उसी समय जोधपुर के पावटा में एक जमीन खरीदी गई थी। इस जमीन का पट्टा तब नगर विकास न्यास ने अरिहंत थिएटर प्राइवेट लिमिटेड के लिए गजेंद्रसिंह शेखावत के नाम से जारी किया था। दोनों ही रियल स्टेट की इस कंपनी में डायरेक्टर थे।
करीब पांच साल तक दोनों ने इस कंपनी को चलाया और वर्ष 2013 में शेखावत इस कंपनी से हट गए। उन्होंने सांसद का चुनाव लड़ने से पहले अपनी हिस्सेदारी और जमीन विक्रम सिंह की कंपनी के नाम कर दी। कोर्ट में विक्रम सिंह से लिंक की जांच के लिए लगी याचिका के मुताबिक हिस्सेदारी के रूप में शेखावत, उनकी पत्नी और रिश्तेदारों को वर्ष 2013 से 2016 के दौरान करीब पांच करोड़ रुपए का भुगतान किया गया। बाद में इस कंपनी को विक्रम सिंह ने नवप्रभा बिल्डटेक के नाम से चलाया।
नगर निगम ने बिल्डिंग पर लगाई थी सवा करोड़ की पेनल्टी
इस बिल्डिंग का निर्माण भी विवादों में रहा। विक्रम सिंह ने जब निर्माण करवाया तो यह क्षेत्र नगर निगम के अधीन आ गया था। निगम ने बिना अनुमति निर्माण पर करीब सवा करोड़ रुपए की पेनल्टी लगाई थी। इसके बाद यूडी टैक्स को लेकर भी विवाद हुआ और बाद में भवन व अन्य संनिर्माण कर्मकार कल्याण उपकर (सेस) के रूप में 24 लाख नहीं चुकाने पर श्रम विभाग ने पेनल्टी सहित 67 लाख रुपए का नोटिस जारी किया था।
मुख्यमंत्री के भाई अग्रसेन गहलोत के घर से बुधवार काे ईडी चार मोबाइल और दुकान के एक कंप्यूटर की हार्डडिस्क व मौजूदा व्यापार के कागजात जब्त कर ले गई। ईडी मोबाइल जांच में यह निकालने का प्रयास कर रही है कि अग्रसेन की सीएंडएफ फर्म का एक्सपोर्टर, छोटी सादड़ी के होलसेलर और सुमेरपुर के रिटेलर के बीच पिछले दिनों बात हुई या नहीं। यदि आपस में बात की है तो अग्रसेन पर आरोप साबित करने में मदद मिल सकेगी, क्योंकि कस्टम कांदला ने आर्थिक अपराध अदालत अहमदाबाद में प्रॉसिक्यूशन की परमिशन के लिए अर्जी लगा दी थी। हालांकि गुरुवार को यह अर्जी खारिज हो गई।
ईडी ने बुधवार को अग्रसेन के मंडोर स्थित घर और पावटा स्थित खाद-बीज की दुकान पर छापे मारकर पूरे दिन पूछताछ की थी। अग्रसेन अभी भी वही कारोबार करते हैं, इसलिए उनका स्टॉक रजिस्टर, बिल व चालान बुक ले गई। इसके अलावा दुकान में लगे कंप्यूटर की हार्डडिस्क भी जब्त की। घर से ईडी प्रॉपर्टी के कागजात व बैंक खातों की डिटेल के साथ परिवार के चार मोबाइल फोन ले गई है। घर में नकदी व जेवरात जब्त नहीं किए हैं, क्योंकि वे आम घरों में मिलने वाले जितने ही थे।
छानबीन में घर की गाड़ियां देखी जाे तीन लाख से ग्यारह लाख तक की ही थीं। अग्रसेन के वकील महेश गहलोत ने बताया कि ईडी की टीमें देर रात निकल गईं, हमने जांच में पूरा सहयोग किया। ईडी दस्तावेजों की जांच के बाद इनके बयान लेगी और उनके सवालों के जवाब उस वक्त दिए जाएंगे।
सीधे सबूत इसलिए जरूरी? क्याेंकि प्रॉसिक्यूशन की परमिशन मिली ही नहीं
अभी तक इस केस में अग्रसेन को सहआरोपी इस आधार पर माना गया है कि ट्रक चालकों ने म्यूरिट ऑफ पोटाश (एमओपी) जोधपुर से लाना बताया था। डीआरआई ने अपने केस में जितना टन एमओपी अग्रसेन की फर्म से बिकना बताया था, देश की इंपोर्टर कंपनी इंडियन पोटाश लि. ने उतना एमओपी तो अग्रसेन को सप्लाई ही नहीं किया था।
डीआरआई ने जो पेनल्टी लगाई थी, उस पर हाईकोर्ट ने भी स्टे दे रखा है। खुद इंडियन पोटाश लि. के ऐसे कई केस देश में चल रहे हैं, क्योंकि एमओपी बेचने की कोई गाइडलाइन अथवा सर्कुलर भी नहीं था, जिससे यह साबित किया जा सके कि अग्रसेन ने गैरकानूनी ढंग से एमओपी बेचा था। उधर, गुरुवार काे अहमदाबाद की काेर्ट में कस्टम कांदला की इस अर्जी काे रिजेक्ट कर दिया।
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