भाजपा सरकार ने 22 जनवरी 2015 को प्रदेश में सिलिकोसिस को गंभीर बीमारी की श्रेणी में डाला था। राजस्थान देश का पहला राज्य था, जिसने सबसे पहले सिलिकोसिस को गंभीर बीमारी माना। इसके बावजूद कोविड-19 में माइंस श्रमिकों की जांच में अनदेखी कर दी गई।

इधर, 29 जून को कलेक्टर ने बैंक, शॉप, इंडस्ट्री, टेलीकॉम, कूरियर आदि सेवाओं के लिए दिशा-निर्देश दिए थे। ऐसे कार्मिकों की जांच करवाने के निर्देश दिए थे। लेकिन प्रशासन भी माइंस श्रमिकों को भूल गया। माइंस मालिकों ने भी श्रमिकों की कोरोना जांच नहीं करवाई।

यह खतरनाक हो सकता है। क्योंकि इन श्रमिकों के फेफड़े पहले से खराब है। कई गंभीर बीमारी से ग्रस्त हैं। इन श्रमिकों के लिए कोई दिशा निर्देश जारी नहीं किए। माइंस में काम करने वाले मजदूरों को कोविड-19 वायरस का बड़ा खतरा है। अधिकतर मजदूरों के फेफड़े पहले से खराब है।

कोई टीबी तो कोई सिलिकोसिस से पीड़ित हैं। ऐसे में सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या माइंस में काम करने वाले खतरे में नही हैं? अगर वहां वायरस फैल गया तो क्या होगा? जबकि लॉकडाउन के दौरान माइंस को प्रारंभ कर दिया गया था।

  • माइंस में काम करने वाले सभी पंजीकृत श्रमिकों की अनिवार्य रूप से कोविड-19 की जांच की जानी चाहिए। सिलिकोसिस जांच के आवेदन करने वालों की सर्वप्रथम जांच कोविड-19 की होनी चाहिए। ताकि खतरा कम से कम हों। - राना सेनगुप्ता, प्रबंध न्यासी, खान सुरक्षा अभियान ट्रस्ट


Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today
Via Dainik Bhaskar https://ift.tt/1PKwoAf

Advertisement

0 comments:

एक टिप्पणी भेजें

 
Top