अब जब कोरोना के कारण रेलवे आर्थिक संकट से जूझ रहा है तो रेलवे अधिकारियों को अपने ही हित की अंग्रेजों के जमाने की सुविधा को बंद करने का खुद आदेश जारी करना पड़ रहा है। न परीक्षा, न इंटरव्यू, जिसे चाहा अपना बंगला पियोन बनाया और फिर रेलवे में स्थाई नौकरी। रेलवे ने अब इस सिस्टम को बंद करने का फरमान जारी कर दिया है। इसके तहत अगर अधिकारियों ने बंगला पियोन लगाने की प्रक्रिया शुरू भी कर दी है तो उसकी भी समीक्षा की जाएगी।
दरअसल, देशभर में रेलवे के छह से सात हजार अधिकारियों को अपने बंगलों में चपरासी नियुक्त करने का अधिकार है। इन कर्मचारियों का कार्यकाल तीन साल का होता है और इन्हें बंगला पियोन के नाम से जाना जाता है। इस तरह एक अधिकारी अपने कार्यकाल में करीब नौ से दस बंगला चपरासी नियुक्त करता है।
इसके लिए उन्हें बस एक युवक के कुछ जरूरी दस्तावेज रेलवे में जमा करवाने होते थे। अगर अधिकारी का तबादला होता तो वह उसे अपने साथ ले जा सकता था। इस दौरान बंगला पियोन 120 दिन काम करने के बाद रेलवे का स्थाई कर्मचारी बन जाता, अधिकारी दूसरी जगह नया बंगला पियोन लगा लेता। इस मामले में अपने लोगों को उपकृत करने और भ्रष्टाचार होने की शिकायतें भी रेलवे विजिलेंस तक पहुंची थीं।
इस वर्ष लगने या प्रक्रियाधीन रहने वालाें की भी हाेगी समीक्षा
रेलवे बोर्ड में संस्थापन के कार्यकारी निदेशक नवीन अग्रवाल ने सभी जोन को आदेश जारी कर कहा है कि अब रेलवे में फ्रेश सब्सटिट्यूट (टीएडीके) की कोई नियुक्ति नहीं की जाए। जुलाई 2020 से जो लगे हैं या प्रक्रियाधीन हैं, रेलवे उनकी भी समीक्षा करेगा।
पिछले कई साल से इस तरह की नियुक्ति को लेकर केंद्रीय प्रशासनिक ट्रिब्यूनल ने रोक लगाने और इसे गलत ठहराने के आदेश जारी किए थे। रेलवे ने पिछले साल जून में इसके लिए एक कमेटी भी बनाई थी। कमेटी ने बंगला पियोन की जगह अधिकारियों को अलाउंस देने की अनुशंसा की थी।
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