उपभोक्ता मामलों की दिल्ली स्थित सर्वोच्च अदालत राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने व्यवस्था दी है कि बीमा कंपनी वाहन मालिक के बीमा दावे को केवल इस आधार पर नकार नहीं सकती कि चालक के पास फर्जी लाइसेंस था। आयोग ने एक निगरानी याचिका का निपटारा करते हुए कहा है कि यह साबित करने का दायित्व बीमा कंपनी पर है कि बीमित व्यक्ति ने लाइसेंस की प्रमाणिकता सत्यापित करने के लिए पर्याप्त सावधानी नही बरती या उसने बीमा पॉलिसी की शर्तों का जानबूझकर उलंघन किया था।
राष्ट्रीय आयोग ने राज्य आयोग जयपुर के निर्णय में आंशिक संशोधन करते हुए श्रीराम जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को आदेश दिया कि वह परिवादी अजमेर के किशनगढ़ निवासी कैलाशचंद शर्मा को वाहन की आई. डी. वी वैल्यू राशि 5 लाख 40 हजार रुपये की 60 प्रतिशत राशि 3 लाख 24 हजार रुपए परिवाद दायर करने की तिथि से 6 प्रतिशत ब्याज सहित निर्णय से 45 दिन में अदा करे।
मामलें के अनुसार परिवादी का ट्रक 13 दिसंबर 2010 को एक्सीडेंट हो गया। परिवादी ने बीमा कंपनी के यहां क्लेम पेश किया जिसे बीमा कंपनी ने इस आधार पर खारिज कर दिया कि वाहन चांदमल चला रहा था, जबकि परिवादी ने चांदमल की जगह किसी शंकर लाल का लाइसेंस पेश कर दिया और मांग के बावजूद चांदमल का लाइसेंस पेश नही किया।
क्लेम खारिज होने के बाद परिवादी ने बीमा कंपनी के खिलाफ वकील सूर्य प्रकाश गांधी के जरिये उपभोक्ता मंच अजमेर में परिवाद पेश कर तर्क दिया कि चांद मल उर्फ़ शंकर लाल एक ही व्यक्ति है, जिसे अनुसंधान के बाद पुलिस ने चार्जशीट में भी सही पाया है, इसलिए पृथक से चांदमल का लाइसेंस देने का औचित्य नही है। शंकरलाल का ड्राइविंग लाइसेंस पेश कर दिया गया है। जिला मंच ने परिवाद स्वीकार कर बीमा कंपनी को आदेश दिया कि वह प्रार्थी को वाहन की क्लेम राशि 5 लाख 40 हजार रुपए 9 प्रतिशत ब्याज सहित अदा करे।
बीमा कंपनी ने मंच के निर्णय के विरुद्ध राज्य आयोग जयपुर में अपील की,लेकिन राज्य आयोग ने जिला मंच अजमेर का फैसला बरकरार रखा। बीमा कंपनी ने राज्य आयोग के आदेश के विरुद्ध राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग में निगरानी याचिका पेश कर आयोग और जिला मंच के निर्णय को गलत बताते हुए आदेश निरस्त करने की गुहार लगाई। वहीं दूसरी ओर प्रार्थी के वकील सूर्य प्रकाश गांधी का तर्क था कि राज्य आयोग ने सभी तथ्यों पर विचार कर तर्क संगत आदेश पारित किया है।
दोनों पक्षों की बहस सुनी
राष्ट्रीय आयोग ने दोनों पक्षों की बहस सुनकर मामले को एक नया मोड़ दे दिया। राष्ट्रीय आयोग ने आदेश में कहा कि बीमा कंपनी ने दो लाइसेंस पेश किए, जिसमे चांदमल का लाइसेंस फर्जी और शंकरलाल का लाइसेंस सही पाया गया, इसलिए फर्जी लाइसेंस के आधार में बीमा कंपनी, क्लेम देने से मना नही कर सकती।
राष्ट्रीय आयोग ने कहा कि प्रार्थी नॉन स्टैंडर्ड क्लेम के तहत 25 प्रतिशत राशि प्राप्त करने का अधिकारी हैं,लेकिन चूंकि ड्राइवर लाइसेंस के बाबत तथ्य छिपाए गए हैं, इसलिए प्रार्थी 5 लाख 40 हज़ार रुपए की 60 प्रतिशत राशि 3 लाख 24 हजार रुपए परिवाद पेश करने की तिथि से 6 प्रतिशत सालाना ब्याज सहित प्राप्त करने का अधिकारी है।
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