यह है जालोर शहर का सुंदेलाव तालाब। साैंदर्यीकरण के कार्य के बाद अब बिल्कुल चंडीगढ़ की सुखना झील की तरह नजर आने लगा है। कुछ महीने पहले जिला प्रशासन ने इसे चंड़ीगढ़ की सुखना झील की तरह विकसित करने की कवायद शुरू की थी। हालांकि अभी यह प्राेजेक्ट चल रहा है, लेकिन धीरे-धीरे अब इस तालाब की तस्वीर बदलने है। यह कहना गलत नहीं हाेगा कि इस तालाब के मूर्त रूप लेने के बाद यह शहर का पहला पर्यटन स्थल बन जाएगा।

अगस्त में हुई अच्छी बारिश के बाद तालाब में पानी की आवक भी अच्छी हुई है, उसके बाद तालाब का आकर्षण और बढ़ गया है। गाैरतलब है कि इस तालाब का प्राेजेक्ट पूरा हाेने के बाद शहरवासियाें काे घूमने-फिरने का एक अच्छा स्थान मिल सकेगा, वहीं टूरिस्ट भी इस स्थान की ओर आकर्षित हाेंगे। इससे पहले जालाेर में शहरवासियाें के लिए माॅर्निंग वाॅक व व्यायाम के लिए काेई उपयुक्त स्थान नहीं था।

चंडीगढ़ की सुखना झील
सुंदेलाव तालाब को विकसित करने को लेकर कलेक्टर हिमांशु गुप्ता ने मुहिम चलाई। चंडीगढ़ की प्रसिद्ध सुखना झील की तरह विकसित करने का लक्ष्य लिया। तालाब के बीच टापू बनाया। टापू पर बैठने के लिए बैंच लगाए गए। यह टापू तालाब को समतल कर उससे निकलने वाली रेत को जमाकर बनाया।

7वीं शताब्दी में हुआ सुंदेलाव तालाब का निर्माण, 147.4 बीघा है भराव क्षेत्र
1300 साल पहले सातवीं शताब्दी में प्रतिहार राजा नागभट्ट ने अपनी माता सुंदरादेवी की याद में इस तालाब का निर्माण करवाया था। उस समय राजा-महाराजा समेत शहरवासियों के पेयजल के लिए इस तालाब के पानी का उपयोग किया जाता था। तालाब 196.25 बीघा क्षेत्र में फैला था, लेकिन तालाब के आसपास कॉलोनियां आबाद हाेने के चलते अब इस तालाब का भराव क्षेत्र 147.4 बीघा क्षेत्र ही रह गया है।

10 लाख रुपए जिला प्रशासन खर्च करेगा। साैंदर्यीकरण और अन्य विकास कार्य भामाशाहाें के सहयाेग से करवाए जाएंगे।

70 साल में 5 बार भर चुका है सुंदेलाव

सुंदेलाव तालाब पिछले 70 साल में 5 बार लबालब हाे चुका है। यह तालाब 1952, 1973, 2006, 2015 व 2017 के दौरान ओवरफ्लाे हुआ था। स्वर्णगिरी पर बारिश के बाद पानी सूरजपोल, तिलक द्वार व बड़ी पोल से होते हुए इस तालाब में आता है। जवाई नदी का पानी तालाब तक लाने रतनपुरा से लेकर तालाब तक 3 किमी कच्ची नहर बनाई गई है।



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The island, built between the 1300-year-old Sundelav Pond, looked like the Sukhna Lake in Chandigarh.
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