मृत्यु का यदि कोई विशेष कारण है तो श्राद्ध पक्ष की नवमी, द्वादशी और चतुर्दशी को श्राद्ध किया जा सकता है। ताकि मृतक की आत्मा के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त की जा सके। वैसे तो जिस तिथि में पूर्वज की मृत्यु होती है उसी तिथि को उसका श्राद्ध किया जाता है लेकिन, विशेष कारणों में मृत्यु की तिथि नहीं, उसका कारण बड़ा माना गया है।
मसलन, जिस पुत्र के पिता जीवित है और उसकी माता की मृत्यु हो गई तो ऐसे पुत्र को अपनी माता का श्राद्ध नवमी को करना चाहिए।
इसी तरह घर का कोई व्यक्ति संन्यासी बन गया है और उसके विषय में ज्ञात नहीं हो तो द्वादशी तिथि को श्राद्ध का प्रावधान है। जिस व्यक्ति की अकाल मृत्यु यानी जल में डूबने, विष के कारण, शस्त्र घात के कारण होती है ऐसे व्यक्तियों का श्राद्ध चतुर्दशी को करना चाहिए।
ज्योतिषी रामभरोसी भारद्वाज ने बताया कि खास कारणों में विशेष श्राद्ध तिथि का विधान है। ताकि भ्रम की स्थिति नहीं रहे। 16 दिन तक चलने वाले श्राद्ध पक्ष में नवमी, द्वादशी और चतुर्दशी तीन महत्वपूर्ण तिथियां मानी गई हैं। इनका विशेष महात्म्य है।
श्राद्ध पक्ष में तीन पीढ़ियों का संबंध माना गया है। यानी व्यक्ति को अपने पिता और बाबा का अथवा मां और दादी का श्राद्ध करने का विधान है।
हर दिन अग्यारी कर सभी पूर्वजों विशेष कर तीन पीढ़ियों को याद करना चाहिए। अमावस्या के दिन सर्व पितृ श्राद्ध किया करना चाहिए, जिससे खानदान के भूले-भटके पितरों के प्रति कृतज्ञता जताई जा सके। इससे कोई भी पितर नाराज नहीं रहते।
रिकाॅल....कुशा की पवित्री से सुजान गंगा में तर्पण
रियायत काल में सुजान गंगा नहर का दर्जा गंगा/ यमुना के समान था। पंडित राम भरोसी भारद्वाज ने बताया कि खिरनी घाट, घोड़ा घाट, कोरिया घाट, जनाना अस्पताल घाट पर श्राद्ध पक्ष में तर्पण होता था। यजमान पानी में खड़े होकर कुशा की तीन पवित्री यानी अंगूठी बनाते थे।
दो कुशा की दायें हाथ, तीन कुशा की बाएं हाथ की अनामिका में धारण कर तथा तीसरी पवित्री को अंजुली में लेकर जल तर्पण करते थे। इस दौरान वेद पाठी वेद मंत्रों का उच्चारण कर तर्पण कराते थे। यह परंपरा 60-70 के दशक तक रही।
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