गोपाल निदेशालय की ओर से जिले की 181 गोशालाओं में आवासित गोवंश के लिए 12 करोड़ 83 लाख रुपए की अनुदान राशि जारी की गई है। इससे लॉकडाउन के दौरान जनसहयोग कम मिलने से आर्थिक संकट झेल रही गोशालाओं को कुछ राहत मिलेगी। खास बात है कि सरकार ने 42 दिन का अनुदान दिया है जबकि गोशाला संचालक की ओर से 90 दिनों का अनुदान दिए जाने की डिमांड की जा रही है।
गोपालन निदेशालय के निदेशक ने केवल 42 दिन का अनुदान देने के ही आदेश जारी किए हैं यानि उन्होंने 48 दिन के शेष अनुदान को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं की गई है। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि शेष 48 दिनों की अनुदान राशि को लेकर उच्चस्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। कोरोनाकाल में जनसहयोग कम मिलने से गौशाला को संचालित करने वाले सभी संचालक व उनका प्रबंधकीय मंडल इन दिनों खासा परेशान है
इसके कई कारण हैं। व्यापारियों के धंधे चौपट हो रखे हैं। गोवंश की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। उधारी पर चारा मिलना और कर्मचारियों का वेतन देना चुनौती बन गया है। साल में केवल छह महीने का अनुदान देने वाली सरकार भी इसमें अब कटौती कर चुकी है। इससे गौशाला संचालक परेशान है। वे गोवंश को खुला छोड़ नहीं सकते, लेकिन रखने के लिए उनके पास बजट भी नहीं है। ऐसे में उन्होंने सरकार से गुहार लगाई है कि उन्होंने अप्रैल, मई, जून 2020 के 92 दिन के अनुदान की जगह 42 दिन का अनुदान देने का जो निर्णय लिया है, उसे बदला जाए। यदि सरकार ऐसा नहीं कर पाएगी तो गौशाला संचालन मुश्किल में पड़ जाएगा।
वर्ष में दो बार दी जाती है अनुदान राशि
गोशालाओं को गोपालन निदेशालय की ओर से वर्ष में दो बार अनुदान राशि जारी की जाती है। इसमें अप्रैल, मई, जून प्रथम चरण 90 दिवस एवं जनवरी, फरवरी व मार्च द्वितीय चरण 90 दिवस का अनुदान दिया जाता है। इससे पहले जनवरी, फरवरी एवं मार्च 2020 में कुल पंजीकृत 206 गोशालाओं में से 177 पात्र गोशालाओं में कुल गोवंश 83992 के लिए 26 करोड़ 82 लाख 28106 रुपए की अनुदान राशि जारी की जा चुकी है।
छोटे पर 20 व बड़े पर 40 रुपए अनुदान
राज्य सरकार ने गौशाला में रहने वाले गोवंश के लिए दर निर्धारित की हुई है। इसमें छोटे गोवंश पर प्रतिदिन 20 रुपए व बड़े पर 40 रुपए का अनुदान तय किया हुआ है। मगर, खर्च इससे कहीं ज्यादा होता है। सरकार जनवरी, फरवरी व मार्च तथा अप्रैल, मई व जून। इन छह महीनों का ही अनुदान देती है जबकि गौशाला संचालक छह महीने तक बगैर अनुदान ही गोशालाएं चलाते हैं। सरकार से मिलने वाले अनुदान से उन्हें काफी सहयोग मिलता था, जो अब कम हो रहा है।
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