थानागाजी केस में आए फैसले में दो मुख्य बातें सामने आई हैं। पहला-यौन अपराधों की शिकायतकर्ता महिलाओं के लिए यह संदेश है कि एक अपराध घटित होने के बाद जिंदगी समाप्त नहीं होती। आज उसे न्याय मिला और वह अब पुलिस महकमे में दूसरी महिलाओं की सुरक्षा के लिए तैनात है। दूसरा-इस केस में पुलिस प्रोस्युकूशन और ज्युडिशियल का अच्छा तालमेल देखने को मिला। इस केस में गाड़ी के तीनों पहियों ने मिलकर बहुत अच्छा काम किया। पुलिस ने ऐसी इन्वेस्टिगेशन की कि कोई कमी नहीं रही।
प्रोस्युकूशन में कुलदीप जैन ने अच्छी तरह से प्रोस्युकूट कराया और न्यायालय ने सभी अभियुक्तों को अधिकतम सजा सुनाई। हालांकि इस केस में एफआईआर दर्ज करने में कुछ देरी जरूर हुई। इस बात ने आंखें खोलीं। पुलिस विभाग में एक कार्यप्रणाली विकसित हुई कि अगर परिवादी के तौर पर खासकर महिला एवं बाल गंभीर अपराधों की रिपोर्ट देता है, तो तुरंत केस दर्ज किया जाता है। ऐसे अपराधों के प्रति पुलिस की संवेदनशीलता बढ़ी है। मुख्यमंत्री के आदेश और पुलिस मुख्यालय के निर्देश की पालना हो रही है। फ्री केस दर्ज हो रहे हैं।
यह बात आती है कि राजस्थान में सबसे अधिक केस दर्ज होते हैं। इसे मैं पॉजिटिव मानती हूं। पहले महिलाएं पुलिस के पास आने से डरती थी। अब वे आ रही हैं और अपनी बात कह पा रही हैं। कुछ मामले झूठे भी हो सकते हैं, लेकिन थानागाजी जैसे सच्चे केस में नतीजा आ रहा है। अगर अपराध करोगे तो जीवन पर्यंत कारावास की सजा मिलेगी। आज की तारीख में सिस्टम और लॉ कमजोर वर्ग और महिलाओं के लिए स्ट्रांग है।
थानागाजी केस के बाद पुलिस काे ज्यादा संवेदनशील किया गया है। हर जिले में महिला अपराध अनुसंधान सेल गठित हुई। इसमें महिला एवं बाल अपराधों के लिए एक डीएसपी स्तर का अधिकारी नियुक्त किया गया। गंभीर प्रकृति के अपराधों को केस ऑफिसर स्कीम में लिया जाता है जिससे केस में कोई खामियां नहीं रहें और अपराधियाें काे जल्द सजा मिल सके। ऐसे केसों में एक एसओपी बनाई गई है। सजा दिलाने में अब साइंटिफिक साक्ष्यों का बड़ा योगदान रहता है। थानागाजी केस में भी साइंटिफिक एवीडेंस का बड़ा योगदान रहा। इस केस में पुलिस मशीनरी एकजुट होकर काम कर रही थी।
ऐसे ही सब केस में काम किया जाए तो परिणाम अच्छे आएंगे। पीड़ित के लिए पहला स्टेप पुलिस रहता है। पुलिस की जांच पर बहुत कुछ निर्भर करता है। हमें विक्टिम शब्द की जगह शिकायतकर्ता शब्द उपयोग करना चाहिए। विक्टिम से ऐसी भावना आती है कि वो किसी चीज की शिकार हुई है। संकीर्ण मानसिकता के शिकार तो वे लोग हैं, जो ऐसा काम कर रहे हैं। ऐसे मामलों में क्राइम करने वालों का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए।
महिलाओं को अपने अधिकार और कानून की जानकारी होनी चाहिए। आज की तारीख में अलवर, भिवाड़ी और भरतपुर में महिला एवं बच्चों संबंधी अपराध ज्यादा दर्ज होते हैं। इनमें में सबसे ज्यादा झूठे अपराध भी इन्हीं जिलों में दर्ज होते हैं। इसका कारण है कि सरकार की महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता बढ़ी, ताे उसका दुरुपयोग शुरू कर दिया गया। कानून का ज्ञान नहीं होने से इन महिलाओं को पता नहीं कि उन्हें उपयोग किया जा रहा है। अलवर पुलिस ने इसके लिए एक प्लान बनाया है कि लोगों से बात की जाएगी।
सेक्सुअल असॉल्ट और सेक्सुअल वायलेंस तभी निकलकर आता है, जब हम यूथ से इस बारे में बात नहीं करते। जब तक ये चीजें दबी रहेंगी, इस तरह की घटनाएं होंगी। इसमें पुलिस, प्रशासन या महिला बाल विकास विभाग अकेला काम नहीं कर सकता। हम सब की जिम्मेदारी है। इसलिए 17 अक्टूबर को पहला सेशन अलवर में शुरू करने जा रहे हैं। यूथ के पास आज इंटरनेट है।
इंटरनेट पर अश्लीलता उपलब्ध है। 13-14 साल के बच्चे आज छोटी बच्चियों के साथ गलत काम कर देते हैं। जब पूछा जाता है तो कहते हैं कि उन्होंने वीडियो देखी। इस मानसिकता को हटाने के लिए इस चीज पर बात होनी चाहिए। इसमें टीचर, अभिभावक, पुलिस व प्रशासन के लोग बात करें। यूथ को लीगल जानकारी दी जाए और उन्हें भटकने से रोका जाए।
तेजस्वनी गाैतम, एसपी, अलवर
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