अपने जुनून और कुछ अलग करने की चाह में महाराष्ट्र के एक एडवोकेट मारुति गोले अपनी गाड़ी लेकर निकल पड़े देश-विदेश के किलों के बारे में जानने के लिए। किले देखते तो कुछ अच्छी स्थिति में मिले तो कुछ जर्जर। किले देखते हुए वहां की हिस्ट्री जानने की ललक हुई। बस, उन्हें मिशन मिल गया। एक शहर से दूसरे शहर, एक देश से दूसरे देश। अब तक नौ साल में एक हजार से ज्यादा किलों के इतिहास को इकट्ठा कर चुके हैं। वे रविवार को जोधपुर के मेहरानगढ़ में थे।
सिटी भास्कर से बातचीत में बताया, शुरुआत तो महाराष्ट्र के किलों से ही की। फिर गुजरात और जम्मू की विजिट की। हिमाचल, हरियाणा के साथ वे अब तक इंग्लैंड, वियतनाम, तुर्कीस्तान, इजरायल और भूटान सहित कई देशों में जा चुके हैं। इन दिनों राजस्थान में आए तो देखा यहां के किले अपेक्षाकृत अच्छी स्थिति में है। मेहरानगढ़ की भव्यता देखकर वे प्रभावित हुए कहा कि जिस तरह मेहरानगढ़ लोगों के रोजगार का साधन बना है, ऐसा ही दूसरे प्रदेशों में भी किलों को बनाना चाहिए। इससे टूरिज्म भी बढ़ेगा।
उन्होंने बताया, मैं यूं ही किले देखने जाता था तो वहां के आर्किटेक्ट, डिजाइन मुुझे आकर्षित करते। दुख भी होता कि कई जगह ऐसी अनूठी हेरिटेज विरासत को संभालने में सरकारें गंभीर नहीं दिख रही। मुझे महसूस हुआ कि आने वाले पीढ़ी इस विरासत के बारे में जान ही नहीं पाएगी तो मैंने इसे ही मिशन बना लिया। अब मैं अपनी इस जर्नी को एक किताब के रूप में लोगों के सामने रखूंगा। वे जहां विजिट करते हैं वहां मौजूद लोगों को दुनिया भर के फोर्ट्स के बारे में बताते हैं ताकि लोग इनके बनाने की शैली और सहेजने के बारे में जान सकें।
फोर्ट विजिट को ही फिट रहने का मंत्र बनाया
गोले ने बताया, मुझे किलों से प्यार है और किले विजिट कर उस देश के किंगडम को फील करते हैं। उन्होंने बताया, किले ऊंचाई पर बने हैं तो वहां तक चढ़ने के लिए हैल्दी डाइट लेनी शुरू की। किलों में चढ़ने और उतरने से ही मेरी फिटनेस भी बनी रहती है। गोले ने बताया कि उनके पूर्वज महाराजा शिवाजी राव के यहां पैदल सेना के प्रमुख थे और ये असर उनमें भी कायम है। इसलिए किलों की यात्रा और चढ़ाई कर व खुद की इस क्षमता को आंकते हैं और आने वाली पीढ़ी के लिए कायम रखना चाहते हैं।
कुछ किले आज भी भव्य तो कुछ खंडहर, सुधार के प्रयास में भी जुटे
गोले ने बताया, बांग्लादेश, तुर्कीस्तान, श्रीलंका और नेपाल के किलों को जब देखा तो लगा कि इनकी हिस्ट्री के साथ इनके डायमेंशन और आर्कीटेक्चर की बारीकियों को भी लिखना और जानना जरूरी है। इन्हें आने वाली पीढ़ी के लिए बचाना जरूरी है। उन्होंने बताया कि नड़दुर्ग, परांदा और रामगंज के किले खस्ताहाल हैं और वे इस बारे में महाराष्ट्र की सरकार को लिखित में बताएंगे। वे कल्चरल मिनिस्टर अादित्य ठाकरे की मदद से इन खस्ता हाल किलों को सुधारने का प्रयास करेंगे।
किताब में मिलेगा किलों का इतिहास
वे इन किलों की विशेषताओं, किस प्रकार से इनसे रोजगार प्राप्त हो सकता है और किस किले का अट्रेक्शन किस तरह बढ़ा सकते हैं, इसे लेकर एक किताब लिखने वाले हैं ताकि शहरों का टूरिज्म बढ़े और लोगों को अपने ही देश में घूमने के लिए नई जगह मिल सके।
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