अगर दृढ़ निश्चय और कठिन परिश्रम का माद्दा हो तो सफलता मिलना अवश्यंभावी है। इसे साबित किया है नदबई के कटारा गांव की सुमित्रा सिंह ने। ससुराल में 10वीं के बाद आगे की पढ़ाई की। बच्चों की देखभाल के साथ ही खेत में मजदूरी भी की। मनरेगा की मेट बनी।
ड्रॉपआउट बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए संदर्भ व्यक्ति फिर साक्षरता की प्रेरक बनी। कक्षा 9 से 12 वीं तक लगातार सप्लीमेंट्री आई। प्रतियोगी परीक्षाओं में भी 10 बार असफलता मिली। लेकिन, हौंसला नहीं खोया, करियर बनाने का दृढ़ निश्चय था। सुमित्रा सिंह अब हिंदी विषय की स्कूल व्याख्याता बन गई हैं। राजस्थान लोक सेवा आयोग अजमेर की ओर से जारी परीक्षा परिणाम में उन्हें 233 वीं रैंक
मिली है।
सुमित्रा सिंह ने अपने संघर्ष की कहानी भास्कर संवाददाता के साथ साझा की। उन्होंने बताया कि करियर के लिए उनके संघर्ष की शुरूआत सन 2005 में आवासीय ब्रिज कोर्स में ड्रॉप आउट बालिकाओं को मुख्यधारा में जोड़ने के लिए संदर्भ व्यक्ति का कार्य करने से हुई। इसके बाद उन्होंने मनरेगा में मेट के रूप में कार्य किया। साक्षर भारत अभियान के तहत सन् 2011 से 2014 तक साक्षरता प्रेरक रहीं।
फिर अगस्त 2017 से 2020 तक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के पद पर कार्य किया। फिर सितंबर 2020 में वरिष्ठ अध्यापक हिंदी पद पर उनका चयन हो गया। वे अभी राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय चिडरऊआ में प्रधानाध्यापक है।
कक्षा 9 से 12वीं तक लगातार आई सप्लीमेंट्री, फिर भी हौसला नहीं छोड़ा
सुमित्रा सिंह के मुताबिक परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति की वजह से वे केवल दसवीं तक ही नियमित विद्यार्थी के रूप में पढ़ पाईं। इसके बाद उन्होंने ससुराल में रहकर कक्षा 12वी से एमए तक स्वयंपाठी विद्यार्थी के रूप में पढ़ाई की। कक्षा 9, 10, 11, 12 वीं में लगातार सप्लीमेंट्री आने के बाद भी उन्होंने हौंसला नहीं खोया। ससुर और पति ने भी उन्हें आगे पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित किया। यही वजह रही कि सन 2010 से 2018 तक लगातार प्रतियोगी परीक्षाओं फ़र्स्ट ग्रेड ,सेकंड ग्रेड, थर्ड ग्रेड में 10 बार असफल होने के बाद भी हिम्मत नहीं हारी और कठिन मेहनत के बल पर अब व्याख्याता हिंदी के पद पर चयन हुआ है।
राजनीति में भी करियर बनाने का प्रयास किया
सुमित्रा सिंह ने बताया कि उन्होंने राजनीति के क्षेत्र में भी करियर बनाने का प्रयास किया। वर्ष 2010 में जिला परिषद के वार्ड नंबर 7 से निर्दलीय चुनाव लड़ा। इसके बाद 2015 में भी उसी वार्ड से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा लेकिन दोनों ही बार हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।
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