पुलिस और माइनिंग विभाग की ओर से शहर में अवैध बजरी पर कार्रवाई नहीं करने की वजह से अवैध बजरी पर लगाम नहीं लग रहा है। शहर में अभी भी जगह-जगह अवैध बजरी के खुले में ढेर लगे हुए हैं। अवैध बजरी रात को आती है और दिनभर ट्रैक्टर-ऊंट गाडियों के माध्यम से शहर के लोगों को महंगे दामों में सप्लाई की जाती है। इससे एक तरफ तो आशियाना बनाना महंगा हो गया है।
दूसरी तरफ बजरी माफिया पनप रहे हैं। कुछ ऐसा ही मामला कालवाड़ रोड पर सामने आया है। कालवाड़ रोड पर अंडर बाईपास के बाद आधा किमी के क्षेत्र में बजरी माफियाओं ने अवैध तरीके से जेडीए की जमीन पर बजरी के ढेर लगा कर जगह-जगह कब्जा कर रखा है। रात को एस्कॉर्ट करके अवैध तरीके से बजरी लाई जाती है।
जेडीए की इस जमीन पर एकत्रित की जाती है और दिन में ट्रैक्टर के माध्यम से महंगे दामों में लोगों को सप्लाई की जाती है। यह सिलसिला लंबे समय से चल रहा है। इसके बावजूद भी माइनिंग विभाग और पुलिस इसे नजरअंदाज कर रही है। यह स्थिति तो तब है, जबकि जहां से अवैध बजरी का कारोबार हो रहा है, वह जगह पुलिस थाना से आधा किमी दूर है। बजरी माफियाओं ने बाकायदा इस जमीन पर जेसीबी, ट्रैक्टर, ट्रॉली, ऊंडगाडी, डंपर खड़े कर रखे हैं।
चार साल में 500 से 1200 रुपए प्रति टन हुई बजरी
चार साल पहले लीगल बजरी 500 रुपए प्रति टन मिल रही थी तो अब अवैध बजरी 1200 रुपए टन में मिल रही है। 50 टन बजरी का ट्रक 60 हजार रुपए में आ रहा है, जबकि चार साल पहले 50 टन बजरी का ट्रक 25 हजार रुपए में मिल रहा था। यह सब अवैध बजरी खनन की वजह से हो रहा है।
अगर लीगल माइनिंग होना शुरू हो जाए तो बजरी की रेट गिर सकती है। इसमें 19 हजार रुपए बजरी भराई तो 9 हजार रुपए का डीजल खर्च हो जाता हैं। करीब 25 हजार रुपए पुलिस और माइनिंग विभाग को मंथली में चले जाते हैं। कुल मिलाकर अवैध बजरी सप्लाई करने वाले को करीब 15 हजार रुपए मिलते हैं। इसमें भी ट्रक का मेंटीनेंस शामिल होता है।
^बजरी का स्टॉक नहीं किया जा सकता। इसकी स्वीकृति भी नहीं जाती। अगर कोई व्यक्ति बजरी का स्टॉक करके बेच रहा है तो अवैध है। इस पर विभाग की टीम लगातार कार्रवाई कर रही है। अगर शहर में अभी भी बजरी के स्टॉक है तो कार्रवाई की जाएगी।
-अनिल गुप्ता, माइनिंग इंजीनियर, जयपुर
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