जरूरी सामान को एक से दूसरे स्थान पर पहुंचाने में जो भाड़ा लगता है उसमें 60 प्रतिशत खर्चा डीजल का होता है। 22 मार्च से अब तक डीजल के रेट 70.36 रुपए प्रति लीटर से बढ़कर 24 जून को 81.77 रुपए प्रति लीटर हो चुके हैं। तीन महीने की अवधि में 11.41 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोत्तरी हो चुकी है।

डीजल में 16.21 फीसदी की वृद्धि का मतलब है कि भाड़े में डीजल का खर्चा अब बढ़कर 60 से 76 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। डीजल की इन दरों का असर सामान की कीमतों में बढ़ोत्तरी के साथ क्षेत्रीय ट्रांसपोर्टरों पर भी विपरीत पड़ रहा है। भिवाड़ी औद्योगिक क्षेत्र में लगभग 800 ट्रांसपोर्ट कंपनियां काम करती हैं। लॉकडाउन में काम बिल्कुल बंद रहा और अनलॉक में शुरू हुआ तो डीजल की बढ़ी हुई दरें हर रोज चलते हुए काम पर ब्रेक लगा रहीं हैं।

जितना टोल उतना डीजल बढ़ गया

ट्रांसपोर्टरों का कहना है कि भिवाड़ी से मुम्बई अाने-जाने में करीब 10 हजार रुपए के टोल लगते हैं। डीजल के बाद सबसे अधिक खर्चा टोल का ही आता है। लेकिन हाल ही में डीजल के जितने रेट बढ़े हुए हैं वह मुम्बई तक टोल देने के बराबर हैं। अगर भाड़े की दरों में 10 फीसदी वृद्धि होती है तो ट्रांसपोर्ट लाइन सही से काम करेगी, नहीं तो सबकी हालत खराब हो जाएगी।

भिवाड़ी से मुंबई तक पहुंचने में खर्चा भी नहीं निकलता

ट्रांसपोर्टर ने बताया कि मुम्बई के लिए 10 चक्का ट्रक 15 टन माल के साथ रवाना किया, जिसको भाड़ा 42 से 45 हजार रुपए एक तरफ से मिला। ट्रक तीन किमी में 1 लीटर डीजल की खपत करता है। भिवाड़ी से मुम्बई तक 1340 किमी में वह 447 लीटर डीजल खाएगा। जिसकी कीमत अब 36523 रुपए होती है जबकि पहले यह खर्चा 31450 रुपए था। डीजल के साथ ट्रक की किश्त, ड्राइवर-कंडक्टर का खर्चा और मुम्बई से लौटने तक ही 10 हजार रुपए के टोल का खर्चा आता है।

ट्रांसपोर्टर अशोक कौशिक ने बताया कि अब जितना भाड़ा मिल रहा है उसमें मुम्बई तक पहुंचना भी मुश्किल है। भाड़े की दरें पुरानी हैं लेकिन डीजल बढ़ने से सारा हिसाब गड़बडा गया है। पहले एक तरफ से कम भाड़े से काम चल जाता था, लेकिन अब जिन शहरों में कोरोना है वहां से भी भाड़ा नहीं मिलता, अगर मिलता है तो सस्ता होता है।

पहले मुम्बई से लौटने का भाड़ा 60 से 65 हजार रुपए के करीब मिलता था, ट्रांसपोर्टर को लौटते समय 15 से 20 रुपए की बचत होती थी, लेकिन वहां अभी कोरोना की वजह से हालात खराब है, वहां से भी अब मुश्किल से 45 से 50 हजार का भाड़ा मिल रहा है।

कोरोना के बाद भिवाड़ी क्षेत्र के फैक्ट्री संचालक भी भाड़ा बढ़ाने को तैयार नहीं है। फैक्ट्रियों में उत्पादन कम है, उनके पास भाड़े के कई विकल्प हैं। इसलिए हम भाड़ा भी नहीं बढ़ा सकते। गाड़ी वाले भी बढ़ाकर पैसे मांग रहे हैं लेकिन बाजार से उस हिसाब से भाड़े नहीं निकल रहे।

डीजल की रेट कम होंगे तो सुधरेंगे हालात

ट्रांसपोर्टर मुकेश भारद्वाज ने बताया कि होटल पर ड्राइवर खाना खाता है उसके भी रेट अब बढ़ गए हैं। अगर भाड़े की दर पुरानी और डीजल बढ़ता रहा तो गाड़ी मालिक कर्जे में डूब जाएंगे। अब बाजार की जो हालात हैं उसमें भाड़ा बढ़ नहीं सकता। एक भाड़ा को लेने के लिए 50 गाड़ी तैयार हैं। बाजार में माल नहीं हैं।

सरकार को डीजल के रेट कम करने चाहिए, डीजल के रेट 65 रुपए लीटर से कम होने चाहिए तब गाड़ी संचालकों को फायदा हाेगा। अगर यही हाल रहा तो गाड़ी की किश्त नहीं भरी जाएंगी और फाइनेंस वाले रिकवरी में खींच कर ले जाएंगे। लॉकडाउन से पहले हम रोजाना औसतन 10 से 12 गाड़ी भाड़े पर भेजते थे, अब मुश्किल से 2 गाड़ी लगा पाते हैं।

भिवाड़ी औद्योगिक क्षेत्र से लॉकडाउन से पहले करीब 3000 हजार गाड़ियां विभिन्न शहरों में ले जाती थीं अब 500 गाड़ियों को ही भाड़ा मिल रहा है। जिनको भाड़ा नहीं मिल रहा उनकी किश्त भी पेंडिंग चल रहीं हैं।



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Diesel spending accounted for 60 to 76%, 80% of truckers are not getting work
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