हम भले ही अनलाॅक-1 में आ गए हैं, लेकिन लाॅकडाउन एवं निगम की लापरवाही आवारा एवं मालिकाें द्वारा छाेड़ी गई गायाें के लिए जानलेवा सिद्ध हुआ है। दरअसल घर में पहली राेटी गाय की निकालना, रिजका डलवाना, गायाें काे खाना-पानी डालना जनजीवन की दिनचर्या से जुड़े रहे हैं। इसी परोपकार के बूते मालिकाें द्वारा छाेड़ दी गई बांझ और आवारा गायों को भी खाना-पानी मिल जाता था।
लॉकडाउन में जब लोग ही घरों में कैद हो गए तो बाहर निकलकर गायों को चारा-पानी देना बंद होना ही था। भूख से तड़पती ऐसी ही सैकड़ों गायें केरू स्थित नगर-निगम के डंपिंग यार्ड में घुस गईं। लेकिन यह कई गायों के लिए श्मशान सिद्ध हुआ। दरअसल निगम की लापरवाही से डंपिंग यार्ड की दीवारें कई जगह से टूटी हुई हैं।
इस कारण गायें अंदर घुस गईं। इन गायों को ना तो कोई निकालने आया और ना ही संभालने। भूखी गायें इसी जहरीले कचरे को खाने लगीं। पिछले दिनों हुई बारिश से कचरा दलदल में तब्दील हो गया। ऊपर से नगर-निगम की एक और लापरवाही से कचरा कई दिनों से सुलग ही रहा है। इससे निकली विषैली गैसें भी जानलेवा सिद्ध हुईं।
इन लापरवाहियों के कारण 6 गायों ने तड़प-तड़पकर दम तोड़ दिया। जबकि कई गायें मरणासन्न स्थिति में हैं। भास्कर टीम ने जब केरू डंपिंग यार्ड जाकर देखा तो ऐसे ही हृदयविदारक दृश्य दिखे। भास्कर ने जिम्मेदार अफसर डंपिंग स्टेशन इंचार्ज व हेल्थ अफसर सचिव मौर्य से को फोन लगाया।
उनसे बात नहीं हो पाई। सूरसागर उपायुक्त अयूब खान से बात करने पर उन्होंने कहा कि- वे लॉकडाउन में जरूरतमंदों को भोजन पैकेट व सूखे राशन किट बांटने की व्यवस्था में लगे हैं। इस मामले में जानकारी मौर्य ही दे सकेंगे। हालांकि उन्होंने कहा कि पशुओं के मरने का मामला गंभीर है, वे इसे दिखवाएंगे।
निष्ठुरता : गायों के मालिक भी संभालने नहीं आए

निगम द्वारा गायों पर लगाई टैगिंग से मालिक का भी पता चल जाता है। यार्ड में गई गायें टैग लगी हैं, लेकिन इनके मालिक भी पता लगाकर इन तक नहीं पहुंचे। भास्कर टीम प्लांट के पीछे से अंदर घुसी तो चारों तरफ आवारा पशुओं का झुंड नजर आया। इसी झुंड में आधा दर्जन गायें व आवारा पशु मरे पड़े नजर आए।
इन पर चील व कौवे मंडरा रहे थे। टीम ने मुख्य गेट पर तैनात कर्मचारी से पशुओंकी माैत के बारे में पूछा। उसने बताया कि मेरा काम ताे यहां गेट खाेलना और कचरे से भरे वाहनाें काे ताेलना है। अंदर ताे वाहनचालक ही कचरा डालने जाते हैं।
विफलता : 20 कराेड़ में बना प्लांट, वेस्ट टू एनर्जी का था प्लान
बढ़ते शहर और जनसंख्या के मद्देनजर 20 कराेड़ रुपए में वर्ष 2006-07 में केरू में सोलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट स्थापित किया था। इसके साथ ही फ्लाइट सेफ्टी भी बड़ा कारण था। उस समय ताे कचरे का पूर्ण निस्तारण करने के साथ ही वेस्ट से एनर्जी बनाने तक की याेजना थी। लेकिन जिम्मेदारों और निगम की लापरवाही से ऐसा कुछ नहीं हो पाया। अब तो यह हजारों मैट्रिक टन सोलिड वेस्ट का पहाड़ बन गया है। शहर से कचरा प्लांट लाने वाले निगम वाहन चालक भी अंदर तक गाड़ी ले जाने से घबराते हैं।
खतरा : फ्लाइंग जोन में डंपिंग यार्ड, मंडराते हैं पक्षी-
केरू डंपिंग यार्ड का आसमान फ्लाइंग जोन में भी है। लेकिन यहां कचरे का निस्तारण नहीं होने व मृत पशुओं के कारण चील-कौवे जैसे पक्षी मंडराते रहते हैं। यह विमानों के लिए घातक सिद्ध हो सकते हैं। जोधपुर एयरबेस पर पांच वर्ष में बर्ड हिट्स के 53 मामले हुए हैं। गत वर्ष के पहले सात माह में ही 9 बर्ड हिट्स के केस हुए थे।
केरू डंपिंग स्टेशन व एयरफोर्स के आसपास गंदगी रहने के कारण पक्षियों की संख्या कम ही नहीं हो रही है। कुछ माह पहले जोधपुर में नीचे उतरते समय एक पक्षी देश के सबसे बेहतरीन फाइटर जेट सुखोई से जा टकराया था, इससे करोड़ों का नुकसान हुआ था।
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