बूंदी जिले के चांदा का तालाब पर निर्मित रामपुरिया बांध टूटने के 25 साल पुराने भ्रष्टाचार संबंधी मामले में काेटा एसीबी न्यायालय ने एसीबी द्वारा पेश की गई एफआर काे अस्वीकार करते हुए अधिशासी अभियंता व अन्य के विरुद्ध प्रसंज्ञान लेकर गिरफ्तारी वारंट से तलब किया है।

मामले में कोटा न्यायालय एवं राजस्थान उच्च न्यायालय के आदेशों की अवज्ञा करने पर अनुसंधान अधिकारी बूंदी एसीबी के प्रभारी डीएसपी तरुणकांत सोमाणी के खिलाफ आईपीसी की धारा 218 व 219 के अपराध प्रथम दृष्टया प्रमाणित मानकर कारण बताओ नोटिस जारी किए हैं और एसीबी के महानिदेशक को भी विभागीय कार्यवाही के लिए आदेश की प्रति भेजकर दो माह में नतीजा भेजने के निर्देश दिए हैं।

भ्रष्टाचार निवारण न्यायालय, कोटा के न्यायाधीश प्रमोद कुमार मलिक ने एसीबी में वर्ष 1995 में दर्ज प्रकरण में आरोपी सिंचाई विभाग बूंदी के तत्कालीन एक्सईएन आरपी छाबड़ा, जेईएन शिवचरण लाल गुप्ता, ठेकेदार ओमप्रकाश, ठेकेदार प्रोपराइटर मै. चौधरी बंधु बूंदी के खिलाफ प्रस्तुत एफआर अस्वीकृत कर धारा 420, 308, 120-बी भादंसं एवं धारा 13 (1) (डी) 13(2) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के अपराधों में प्रसंज्ञान लेकर आरोपियों को गिरफ्तारी वारंट से तलब करने का आदेश पारित किया।

यह था मामला : एफआईआर के अनुसार 30 जून, 1994 को थाना तालेेड़ा जिला बूंदी पर उदा गुर्जर निवासी ग्राम चांदा का तालाब ने पुलिस थाना तालेड़ा पर उपस्थित होकर एक रिपोर्ट दी। जिसमें बताया गांव चांदा का तालाब के ऊपर आडी नदी पर रामपुरिया बांध का निर्माण कार्य करीब 8-10 साल से सिंचाई विभाग द्वारा करवाया जा रहा था।

बांध का निर्माण कार्य अधिशासी अभियंता, सहायक अभियंता, कनिष्ठ अभियंता बूंदी की देखरेख में किया जा रहा था। बांध के निर्माण कार्य में सही मेटेरियल काम में नहीं लिया, जिससे 26 जून, 1994 को सुबह करीब 2.30 बजे बांध की दीवार टूट गई। इससे हमारे गांव के लोगों की जान खतरे में पड़ गई। इस पर थाना तालेड़ा में अभियोग संख्या 156/1994 धारा 308, 420, 431 भादंसं में दर्ज कर तफ्तीश जिला पुलिस द्वारा की गई।

एडीजी के निर्णय को भी पलट दिया
प्रकरण में अनुसंधान रिपोर्ट पेश करने वाले डीएसपी तरुणकांत सोमाणी द्वारा न्यायालय आदेशों की अवज्ञा करने एवं पूर्व में दिए गए न्यायालय आदेशों के विरुद्ध पुनः एफआर पेश करने पर धारा 218, 219 भारतीय दंड संहिता के तहत कार्यवाही करने का आधार मानते हुए कारण बताओ नोटिस जारी कर तलब किया।

वहीं दूसरी ओर उक्त पुलिस उपाधीक्षक ने अपने विभागीय उच्चाधिकारी तत्कालीन एडीजी अजीत सिंह व एडिशनल एसपी की अाेर से दिए हुए चालानी निर्णय के विपरीत न्यायालय में एफआर अनुसंधान नतीजा (साक्ष्य के अभाव में) प्रस्तुत करने पर एसीबी डीजी को आदेश की प्रति भेजकर विभागीय अनुशासनात्मक कार्यवाही अमल में लाने व दो माह में कोर्ट को अवगत कराने के निर्देश दिए।

25 साल तक लटकता रहा मामला

  • पहले पुलिस जांच कर रही थी, फिर राज्य सरकार ने 26 सितंबर, 1995 को आदेश जारी करने पर मामला एसीबी में स्थानांतरित किया गया। ब्यूरो ने 6 अक्टूबर, 1995 को जांच करके आरोपी एक्सईएन आरपी छाबड़ा, एईएन मजहर उस्मानी, जेईएन एमपी शर्मा व शिवचरण लाल गुप्ता, ठेकेदार ओमप्रकाश के खिलाफ धारा 420, 308, 120-बी भादंसं एवं धारा 13(1)(डी)13(2) पीसी एक्ट 1988 में प्रकरण दर्ज कर अनुसंधान शुरू किया गया।
  • अनुसंधान के बाद ब्यूरो द्वारा प्रकरण को साबित नहीं मानते हुए अंतिम प्रतिवेदन (अदम वकू) में देने का निर्णय लेते हुए केवल कनिष्ठ अभियंता शिवचरण लाल गुप्ता के खिलाफ सीसीए नियम 16 में विभागीय जांच करने का निर्णय किया गया। प्रकरण में अंतिम प्रतिवेदन संख्या 97/1999 में 13 अक्टूबर 1999 अदम सबूत न्यायालय में पेश किया गया। न्यायालय ने उक्त एफआर को अस्वीकृत कर दिया और अभियुक्तों के विरुद्ध अभियोजन स्वीकृति सक्षम प्राधिकारी से प्राप्त करने के लिए ब्यूरो को निर्देशित किया गया।
  • कोर्ट के उक्त ऑर्डर पर मुल्जिम की ओर से राजस्थान उच्च न्यायालय में एफआईआर निरस्तीकरण व न्यायालय आदेश के विरुद्ध प्रस्तुत याचिकाएं दायर की गई, जो उच्च न्यायालय द्वारा अपास्त कर दी गई। इसी दौरान आरोपी मजहर उस्मानी एवं एमपी शर्मा का निधन हो गया।
  • मौजूदा अनुसंधान अधिकारी बूंदी एसीबी के डीएसपी तरुणकांत सोमानी ने 11 जनवरी, 2016 एवं 20 मार्च, 2020 को न्यायालय में प्रस्तुत रिपाेर्ट (सबूत के अभाव में एफआर) को अस्वीकृत कर न्यायालय द्वारा आदेश पारित करते हुए अभियुक्तों आरपी छाबड़ा, शिवचरण लाल गुप्ता व ठेकेदार ओमप्रकाश चौधरी के विरुद्ध धारा 420, 308, 120-बी भादंसं एवं धारा 13(1)(डी)13(2) पीसी एक्ट के अपराधों में प्रसंज्ञान लेकर उक्त अभियुक्तगण को गिरफ्तारी वारंट से तलब करने का आदेश पारित किया।

एफएसएल की रिपोर्ट को भी नकारा
एसीबी कोर्ट ने अपने आदेश में पत्रावली पर उपलब्ध एफएसएल रिपोर्ट का भी उल्लेख किया है। एफएसएल रिपोर्ट और पूर्व आईओ द्वारा मामले में कुछ इस तरह के निष्कर्ष दिए गए थे-

  • जिस स्थान से बांध टूटना बताया गया है, उस स्थान की मिट्टी की डेन्सिटी 1.8 इंच के बजाय 1.56 इंच पाई गई।
  • बांध के निर्माण के साथ ही पिचिंग करना नहीं पाया गया, बोरो एरिया अधिक गहरा खोदा गया, मिट्टी के ढेले बोरो एरिया के गड्ढों की जगह बांध पर ही तोड़े गए या तोड़े ही नहीं गए।
  • जड़ें एवं टहनियां बांध के निर्माण स्थल पर पाई गई। जिससे भी बांध में छेद होने की आशंका रही।
  • मिट्टी को समान रूप से नहीं फैलाया गया, स्पेसिफिकेशन के अनुसार मिट्टी की परत पर 8 टन वजनी स्टीम रोलर नहीं चलाया गया।
  • बांध पर पानी के छिड़काव के लिए पावर पंपसेट एवं पाइप लाइन की प्रॉपर व्यवस्था नहीं की गई, न ही बांध निर्माण स्थल पर रात को लाइट की प्रॉपर व्यवस्था थी।
  • इन सबके बावजूद भी उक्त अधिकारियों द्वारा उक्त सभी कार्यों का भुगतान ठेकेदार को कर दिया गया और आरोपी आरपी छाबड़ा ने बांध को 98 आरएल ऊंचाई के बाद भी उच्चाधिकारियों से लिखित स्वीकृति लिए बिना ही स्वेच्छा से पार्ट सेक्शन का कार्य भी शुरू कर दिया गया था।
  • ठेकेदार ने 18 माह में पूरा किया जाने वाला निर्माण कार्य छह साल से ज्यादा समय में पूर्ण किया और वह भी निर्धारित मापदंडों के अनुसार नहीं किया।
  • बांध के निर्माण कार्य को स्पेसिफिकेशन के अनुसार नहीं कर बांध कमजोर बनाया गया, जिससे एक ही बरसात में बांध टूट गया।
  • उक्त कार्य निर्धारित मापदंडों के अनुसार नहीं होने से राज्य सरकार को 2 लाख 90 हजार 117 रुपए की अनुचित हानि व ठेकेदार को अनुचित लाभ पहुंचाया गया।


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Not guilty even after 25 years of investigation, issued warrants against the then XEN, JEN and contractor
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