कोराेना का इफेक्ट राखी बाजार पर भी है क्योंकि कोरोना संक्रमण के डर से बहनें भाइयों को राखी भेजने से कतरा रही हैं। उनका मानना है कि राखियां कई हाथों से गुजरेंगी। इसलिए कोरोना संक्रमण का खतरा बन सकता है। इसलिए बहुत से भाइयों ने बहनों से राखियां नहीं भेजने का भी आग्रह किया है। वादा किया है कि बाजार से खरीद कर खुद बांध लेंगे। इसलिए इसका असर बाजार पर है। करीब 30 फीसदी कारोबार कम होने का आकलन है।
थोक विक्रेता प्रतीक भाया कहते हैं कि हरियाली तीज थोक विक्रेताओं के लास्ट वर्किंग डे माना जाता था। क्योंकि इस दिन से रिटेल की सेल उफान पर आ जाती थी। किंतु इस बार ऐसे हालात नहीं है। सेल निकल तो रही है। लेकिन उम्मीद से कम है। इसकी वजह महिलाएं इस बार बाहर राखियां कम भेज रही है। इसके अलावा हरियाली तीज पर ठाकुर जी के लिए राखी खरीदने का प्रचलन था, लेकिन मंदिर बंद है। इसलिए डिमांड काफी कम है।
अब आखिरी तीन-चार दिन में सेल निकलने की संभावना है। उल्लेखनीय है कि जिले में राखियों के थोक विक्रेता करीब 10 और खेरिज विक्रेता करीब 250 से ज्यादा है। करीब एक करोड़ रुपए का यह सीजनल बिजनेस है। रक्षा बंधन पर्व 3 अगस्तको मनाया जाएगा।
बाजार में हुआ चाइनीज राखियों का बायकाट
इस बार बाजार में चाइना बायकॉट का असर दिख रहा है। लोग भी इंडियन राखियों को लेना ही पसंद कर रहे हैं। इसका फायदा अलवर, दिल्ली, कोलकाता, अहमदाबाद के कारीगरों को मिला है। बाजार में बच्चों के लिए चाइनीज लाइटिंग फैंसी राखियां न के बराबर हैं। विक्रेता राहुल गर्ग कहते हैं कि सीमा पर संकट के कारण विक्रेताओं का मालूम था कि बाजार में चीन के खिलाफ आक्रोश है।
इसलिए थोक और खैरिज सभी ने ग्राहकों के मूड को भांपते हुए चाइनीज आइटम का स्टाक नहीं किया। इस बार उसकी जगह मेटल, छोटा भीम और ग्रीटिंग वाली राखियां बाजार में उपलब्ध हैं। व्यापारियों का कहना है कि हर साल 20 प्रतिशत चाइनीज राखियों की बिक्री होती थी। चाइनीज राखियों की क्वालिटी इतनी अच्छी नहीं होती है। स्थानीय राखियों की क्वालिटी अच्छी होती है और उनके दाम भी कम हैं। देसी राखियों में चूड़ा और लूंबा राखी की अच्छी डिमांड है।
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