मानसून की बेरुखी के चलते धान उत्पादक किसानों के चेहरों पर मायूसी की झलक दिखाई देने लगी है। खेतों में धान की रोपाई करने के बाद किसान मानो फंस गए हैं और जिन किसानों ने सीधी बुवाई की है, उनकी फसल की आधी-अधूरी फुटान हुई है। बिजली छह घंटे मिलने से धान को बचाने के लिए किसानों को महंगे मोल का डीजल जलाना पड़ रहा है। उसमें भी हालात यह हैं कि पानी का लेवल नीचे जाने से किसानों को पाइप उतारने पड़ रहे हैं। चाहे रोपाई करो या सीधी बुवाई, धान की फसल को पानी की आवश्यकता अधिक रहती है।
इस बार धान का अनुमानित रकबा 50 हजार हैक्टेयर माना जा रहा है, जबकि पिछले साल 57 हजार हैक्टेयर में धान की रोपाई हुई थी। बरसात की उम्मीद लगाए बैठे किसान धान की रोपाई करने में लगे हुए हैं, लेकिन अब बरसात नहीं होने से उन्हें फसल बचाने की चिंता सताने लगी है। हालांकि धान की रोपाई पूरे महीने चलेगी।
पिछले साल की तुलना में अब तक आधी बरसात
वैसे मानसून जून मध्य में सक्रिय होता है, लेकिन इस बार पूरा महीना निकल गया और जुलाई माह का भी एक सप्ताह गुजर गया है। अभी तक मानूसन सक्रिय नजर नहीं आ रहा है। तीन-चार दिन बरसात भी हुई, लेकिन वह भी महज 10-15 मिनट से अधिक नहीं हुई है। इतनी सी बरसात से न तो किसानों को फायदा मिल रहा है, न ही आमजन को उमस से राहत मिल पा रही है। पिछले साल एक जून से 5 जुलाई तक 843 एमएम बरसात हो चुकी थी, लेकिन इस साल एक जून से अब तक 494 एमएम बरसात हुई है।
पानी की कमी से जमीनों में आने लगी दरारें, खरपतवार भी उगने लगी
पानी की कमी के कारण कई किसानों के खेतों में दरारें आने लगी हैं। यहां तक कि खरपतवार भी उग आई है। जिन किसानों ने धान की पौध तैयार कर जुलाई के फर्स्ट वीक में अपने खेतों में धान की रोपाई कर दी थी, लेकिन इसके बाद बरसात नहीं होने से जमीनों में दरारें दिखाई दे रही हैं। किसानों का कहना है कि जमीन की प्यास तो बरसात से ही बुझ सकती है। ट्यूबवेल से पानी पिलाते हैं तो कुछ घंटों बाद ही खेत वापस सूखे से नजर आने लगते हैं।
ट्यूबवेल भी छोड़ रहे किसानों का साथ
धान की रोपाई करने के बाद कई किसान अपने ट्यूृबवेलों से खेतों में पानी भर रहे हैं, लेकिन यहां भी किसान उलझ गए हैं। कई किसानों के खेतों में पानी का लेवल नीचे चले जाने से ट्यूबवेल भी जवाब देने लगे हैं। आए दिन मोटरें खराब हो रही हैं, जिन्हें ठीक करवाना पड़ रहा है। किसानों का कहना है कि एक बीघा धान की फसल को पानी पिलाने के लिए एक घंटे में 100 रुपए का डीजल जल जाता है। एक बीघा खेत चार घंटे में पानी पीता है। ऐसे में 400 रुपए का डीजल जल जाता है। बिजली छह घंटे ही मिलती है, उससे तो डेढ़ बीघा खेत पानी पी पाता है।
किसानों की पीड़ा...जो धान रोपे हैं, उसे बचाने के लिए भी है संकट, 100 बीघा की जगह 25 बीघा ही रोपे
- राताबरड़ा के किसान दिलबाग सिंह ने कहा कि हर साल 100 बीघा मंे धान की रोपाई करते हैं। बरसात नहीं आने से इस बार 25 बीघा में ही धान की रोपाई हो सकी है। 75 बीघा का बीज तैयार है, लेकिन बरसात आए तो उसे रोपें। जो धान रोपा है, उसे बचाने के लिए भी संकट आ गया है। हजारों रुपए खर्च हो गए।
- कापरेन के किसान गोलू पंचोली ने कहा कि बरसात की उम्मीद में 20 बीघा में धान की सीधी बुवाई कर दी, लेकिन अब बरसात नहीं होने से 40 प्रतिशत धान ही उगा है। उसमें भी खरपतवार दिखाई दे रही है। अब यदि जल्दी ही बरसात नहीं हुई तो फसल खराब हो जाएगी।
- गणपतपुरा के किसान मांगीलाल मीणा ने कहा कि बिजली पूरी नहीं मिलती है। छह घंटे बिजली देने की बात कही जाती है, उसमें भी कटौती हो जाती है। 15 बीघा में धान की रोपाई की है और 10 बीघा में सीधी बुुवाई की गई। बरसात नहीं आती है तो फसल चौपट हो जाएगी।
- गणेशपुरा के किसान धर्मराज मीणा ने कहा कि धान की रोपाई करने के बाद महंगे मोल के डीजल से बचाना पड़ रहा है। प्रतिदिन एक हजार से 1200 रुपए का डीजल जल रहा है। ब्याज से पैसे लेकर फसल को बचाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
- जयस्थल. कस्बे सहित दोस्ताना, कोड़क्या बालाजी, करवाला की झोंपड़ियां, बालदड़ा, ओहड़ी गांवों के किसानों ने हंकाई, जुताई, बुवाई कर दी, लेकिन बरसात नहीं होने से फसल सूखने की चिंता सताने लगी है। किसानों का कहना है कि जल्द बरसात नहीं हुई तो उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ेगा।
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