जेडीए के ठेकेदारों ने चेतावनी दी है कि 31 जुलाई तक उनके सात साल के बकाया 110 करोड़ रुपयों का भुगतान नहीं किया तो 1 सितंबर से विकास कार्यों पर ब्रेक लगा देंगे। इस संबंध में ठेकेदारों ने जेडीए आयुक्त मेघराज सिंह रतनू को मुख्यमंत्री के नाम का ज्ञापन सौंपा है।
पिछले एक साल से संघर्ष कर रहे ठेकेदारों ने स्पष्ट कहा कि अब धैर्य जवाब दे गया है। ठेकेदारों ने कहा कि यूडीएच की ओर से 5 जून 2020 को जारी पत्र की पालना सुनिश्चित कर ठेका फर्मों को राहत पहुंचाएं। ऑल राजस्थान कॉन्ट्रेक्टर एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष नरेंद्र सोलंकी की अगुवाई में सोमवार को ठेकेदारों का एक शिष्टमंडल जेडीए आयुक्त से मिला।

उन्हें मुख्यमंत्री के नाम का सात सूत्री मांग पत्र सौंपा। ठेकेदारों ने पुराने किए गए विकास कार्यों का मेजरमेंट करवाने, पारित किए गए बिलों का जल्द भुगतान करने, लंबे समय से पेंडिंग टाइम एक्सटेंशन प्रकरण को पारित करवाने के साथ ही 17 जून 2020 को वित्त विभाग के आदेश में एसडी/पर्फोमेंस गारंटी राशि लौटाने की मांग की। इसके साथ ही ठेकेदारों ने परिसर में बैठने के लिए अलग से कक्ष आवंटित करने की मांग की।

आयुक्त बोले- खजाने में इतनी राशि नहीं, ठेकेदारों ने कहा-पैसे नहीं तो नए टेंडर क्यों लगा रहे?

राज्य गवर्नमेंट के नियम के अनुसार बिल्डिंग कार्य में 2 करोड़ व सड़क कार्य में 3 करोड़ तक किसी भी प्रकार की कंडीशन नहीं लगाए जाने का प्रावधान है, लेकिन एक्सईएन अपनी मनमर्जी से शर्तें थोप रहे हैं जो अनुचित हैं। ठेकेदारों की मांग पर आयुक्त ने कहा कि अभी खजाने में इतनी राशि नहीं है, इसलिए जब राशि जमा होगी तो इस पर भी विचार करेंगे।

सोलंकी ने बताया कि वर्तमान समय में जेडीए के 50-60 करोड़ रुपए के विकास कार्य चल रहे हैं। आयुक्त के बाद संभागीय आयुक्त व जेडीए अध्यक्ष समित शर्मा को भी मुख्यमंत्री को भेजी ज्ञापन की कॉपी सौंपी। सोलंकी ने कहा कि पैसा नहीं हैं तो फिर नए टेंडर क्यों निकाल रहे हैं? जेडीए नई इनोवा क्यों खरीद रहा है? बंगलों पर एक-एक करोड़ रुपए का व्यर्थ खर्च क्यों कर रहे हैं? अफसरों की गाड़ियां और बंगलों की साज-सज्जा के लिए तो जेडीए पैसा खर्च कर रहा है, लेकिन ठेकेदारों को भुगतान की बात आती है तो खजाना खाली होने की याद आ जाती है।
सात साल में छह ठेकेदार दुनिया छोड़ चुके हैं
जेडीए में सात साल के लंबे समय तक विकास कार्यों के बदले राशि का भुगतान नहीं होने और दिनों-दिन आर्थिक स्थिति खराब होने के सदमे से सात साल में छह ठेकेदार की असामयिक मृत्यु हो गई है। इनमें से कुछ ठेकेदारों ने बाकायदा तत्कालीन अफसरों को बकाया भुगतान अटकने से होने वाली समस्याओं से भी अवगत करवाया, लेकिन उन अफसरों का तब भी कलेजा नहीं पसीजा।



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