मृत्यु भाेज जैसी कुप्रथा ने समाज का अहित ही किया है। लाेग दिखावा करने की वजह से कर्ज के जाल में फंस गए। एक दिन के आयोजन पर लाखों रुपए खर्च करने से असंख्य परिवारों की आर्थिक स्थिति खराब हो गई। धर्मगुरू भी चाहते हैं कि ये कुप्रथा बंद होनी चाहिए। इसका शास्त्रों में कहीं कोई उल्लेख नहीं है। धर्मगुरुओं का कहना है कि शास्त्रों में मृत्युभोज करना कहीं नहीं लिखा, यह आपसी होड़ का नतीजा भगवान राम ने भी सहज भाव से अपने पिता काे जंगल में रहकर तर्पण किया था।

धर्म गुरुओं का कहना... मृत्युभोज पर रोक लगने से गरीब तबके को कर्ज से मिलेगी मुक्ति

1. कुप्रथा काे राेकने के लिए आगे आना हाेगा
वेकटेंश बालाजी दिव्यधाम के सुदर्शनाचार्य मधुसूदन ने बताया कि शास्त्रों में कहीं भी मृत्युभोज का उल्लेख नहीं है। सिर्फ ब्रह्मभोज का उल्लेख है। कहीं भी गांव-ढाणी या अन्य बड़े स्तर पर मृत्युभोज के आयोजन के बारे में शास्त्र नहीं कहते हैं। यह कुप्रथा सामाजिक रुतबा दिखाने के लिए शुरू हुई। इसका असर आमजन पर हुआ।

2. शास्त्र गाय काे रोटी देने के लिए कहते हैं
हीरानाथ आश्रम के रूपनाथ महाराज ने बताया कि घर की शुद्धि के लिए शास्त्र ब्रह्मभोज के आयोजन और गाय काे रोटी देने के लिए कहते हैं। समय के बदलाव के साथ समाज में एक विकृत कुप्रथा शुरू हुई। इस कुप्रथा के जन्म से ही सामाजिक स्तर पर प्रभाव दिखाई देने लगा। जाे लाेग समृद्धशाली थे, वे मनमाने तरीके से इस पर खर्च करने लगे।

3. समाज को आगे आकर कदम बढ़ाना चाहिए
बैकुंठधाम मंदिर के सुमेरगिरी महाराज ने बताया कि सामाजिक स्तर पर शुरू से ही जिस प्रथा का विराेध हाेना चाहिए था, वह कुप्रथा सामाजिक स्तर पर लाेगाें का कितना नुकसान कर चुकी है। इसके बारे में कुछ भी कहा नहीं जा सकता है। कोरोना काल ने इस प्रक्रिया में बदलाव को तेज किया है। समाज को भी बदलाव लाना चाहिए, जिससे समाज में ऐसे आयाेजन नहीं हाे।

4. शास्त्र में नहीं है उल्लेख, गलत परंपरा
पीठाधीश्वर मधोमठ तिजारा के स्वामी ललित माेहनाचार्य ने बताया कि मृत्यु उपरांत मृत्यु भाेज ऐसा कहीं शास्त्रों में उल्लेख नहीं मिलता है, लेकिन हमारे गांव देहात में रुढिवादी परंपरा की वजह से अभी भी लाेग मृत्यु भाेज का आयोजन करते हैं। धर्मगुरु, सामाजिक कार्य करने वाले लाेग, समाज के प्रमुख लाेग ऐसी जन चेतना लेकर आएंगे कि समाज जागरुक बन जाए व ये परंपरा रुक जाए।

आगे आया समाज... यह कुप्रथा बंद हो

^पिछले 10 साल से मृत्युभाेज समाप्त करने के प्रयास किए जा रहे हैं। इससे पूर्ण सहमत हैं कि इस पर राेक लगे जिससे समाज का भला हाे। लाेग बर्बादी से बचें।
-नरेंद्र कुमार जागा, ट्रांसपाेर्ट नगर अलवर
^पिछले 17 सालाें से एक भी मृत्युभाेज में भाेजन करने नहीं गया। भविष्य में भी ऐसा नहीं करूंगा।
-घनश्याम मीणा
^पिछले 10 साल से किसी के मृत्युभाेज में शामिल नहीं हुआ। आगे भी नहीं जाऊंगा।
-प्यारेलाल सैनी
^मृत्युभाेज खर्चीला आयाेजन है। इससे मृतक के पारिवार पर लाखाें रुपए के खर्च का बाेझ आ जाता है। इसमें बदलाव हाेना चाहिए। इसके लिए सक्रियता से अभियान चलाया जाएगा।
-राम तरुण, संयाेजक, अस्मिता अभियान और राजबाला, अध्यक्ष, महिला अधिकार मंच
^मृत्युभाेज जैसी कुप्रथा काे राेकने का दायित्व समाज काे निभाना हाेगा।
-माेहनलाल माैर्य, चतरपुरा, बानसूर
^मृत्युभोज जैसी कुप्रथा पर रोक लगाने की भास्कर ने जो पहल की, वह सराहनीय है। इसमें कई गरीब लोग बर्बाद हो जाते हैं। यह कुप्रथा बंद होनी चाहिए।
–श्रवणकुमार शर्मा



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