कोरोना ने न्यायपालिका को वर्चुअल राह दिखाई है। अब फिजिकल कोर्ट के साथ वर्चुअल कोर्ट भी चलाने पड़ेंगे। जैसे-जैसे वर्चुअल कोर्ट का चलन बढ़ेगा, इसकी कार्यप्रणाली भी सरल होती जाएगी और लोग भी पसंद करने लगेंगे। हमारे संविधान की भी यही मंशा है, कि प्रत्येक व्यक्ति को न्याय शीघ्र व सहज मिले।
वर्चुअल सुनवाई से आमजन या वकील को सुप्रीम कोर्ट के लिए दिल्ली या हाईकोर्ट के लिए किसी राज्य की यात्रा नहीं करनी पड़ेगी। वे किसी भी जगह से बहस कर सकते हैं। ऑनलाइन का सबसे बड़ा फायदा यह होगा, कि वकील भी इधर-उधर की बात नहीं करके उनका पूरा फोकस केस पर होगा। टू द पॉइंट बहस करेंगे और टू द पॉइंट फैसला आएगा। अगर इसे लागू कर दिया गया तो समय की बचत के साथ न्याय मिलना सस्ता और सहज हो जाएगा।
कोरोना काल में मुकदमों की जो ऑनलाइन सुनवाई ज्युडिशियरी का ‘स्थाई फीचर’ बन गया है। सुप्रीम कोर्ट व कुछ हाईकोर्ट में 100% वर्चुअल सुनवाई हो रही है। काेराेना खत्म होने के बाद फिजिकली सुनवाई शुरू होगी और हो सकता है इसका समय बढ़ जाएगा, फिर भी वर्चुअल कोर्ट व सुनवाई चलती रहेगी। इसकी सफलता न्यायपालिका प्रशासन व वकीलों की तैयारी पर निर्भर करेगी। वैसे हालात ने हमें तैयार कर लिया है, इसलिए अब ज्यादा तैयारी की जरूरत नहीं होगी।
मैं अपने अनुभव से कह सकता हूं, कि वर्चुअल सुनवाई से न्यायालयों में मामलों का निस्तारण भी तेजी से होगा। फिजिकल सुनवाई में अक्सर वकील जज की तरफ कम देखते हैं और पीछे गैलेरी में ज्यादा देखते हैं। इधर-उधर की बात ज्यादा करते हैं। कोर्ट भी ज्यादा नहीं रोक पाता है। कई बार कुछ जज भी ज्यादा बोलते हैं। लेकिन वर्चुअल सुनवाई में जज व वकील दोनों को ही टू दी पॉइंट बोलना व सुनना पड़ेगा।
वकील काे तैयारी भी अच्छी करनी पड़ेगी। उन्हें ऑन स्क्रीन ही बताना होगा कि अमुक पेज पर अमुक रेफरेंस है या एविडेंस है। वर्चुअल सुनवाई में कम से कम एक तिहाई समय तो जरूर बचेगा। एक अन्य पहलू देखे तो अब शत-प्रतिशत ई-फाइलिंग हो रही है। सुप्रीम कोर्ट में हाईकोर्ट से तो हाईकोर्ट में ट्रायल कोर्ट से भी रिकॉर्ड ई-फाइलिंग या डिजिटल प्लेटफॉर्म से आ रहा है।
वर्चुअल कोर्ट के लिए सीआरपीसी व सीपीसी में कुछ संशोधन करने होंगे। अभी भी कई मामलों में आतंकवादी या अन्य कुख्यात अपराधियों को कोर्ट में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश किया जाता है। जैसे किसी एक कोर्ट में सौ क्रिमिनल केस लगते हैं और सौ मुजरिम हैं तो उस दिन सबको लाना पड़ता है। इसके लिए कितना इंफ्रास्ट्रक्चर व पुलिस गार्ड, वाहन आदि की व्यवस्था करनी पड़ती है।
वर्चुअल सुनवाई में इन सबकी जरूरत ही नहीं रहेगी। वर्चुअल कोर्ट को पूरी तरह स्थापित होने में थोड़ा समय जरूर लगेगा, क्योंकि भारत में इन सबके लिए इतनी सुविधाएं नहीं है। टेक्नोलॉजी भी यह सारा भार उठा पाएगी या नहीं उठा पाएगी, इसमें भी संदेह है, क्योंकि जितने भी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म अा रहे हैं, ज्यादातर बाहर के हैं। लेकिन अब ज्युडिशियरी को डिजिटली टेक्नोलॉजी अपनानी ही होगी।
पिछले चार महीने से वर्चुअल सुनवाई हो रही है। इसमें कुछ दिक्कतें भी होंगी, जिन्हें निस्तारित किया जा सकता है। इस संबंध में जिला न्यायालय संबंधित हाईकोर्ट और हाईकोर्ट सुप्रीम कोर्ट को अवगत करवाए। जिनका समाधान ज्युडिशियरी के स्तर पर हो सकता हो, उन्हें वहां से करवाए, अन्यथा विधायिका के स्तर पर समाधान होना चाहिए।
वर्चुअल कोर्ट से बुजुर्ग वकील घर से ही प्रैक्टिस कर सकते हैं। युवा वकीलों को ज्यादा फायदा होगा, क्योंकि वो टेक्नोलॉजी में माहिर हैं। एक लैपटॉप और सुप्रीम कोर्ट केसेज ऑनलाइन व एआईआर से ही उनका काम हो जाएगा। लॉ कॉलेज में कोर्स बदलने की जरूरत रहेगी। छह महीने प्रैक्टिकल ट्रेनिंग लेनी होगी। बार एसोसिएशन व बार काउंसिल भी सेमीनार आयोजित करने में आगे आ सकती हैं। अभी रिपोर्टेड जजमेंट की बुक आती है। फिर वर्चुअल हियरिंग की बुक्स आ जाएंगी।
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