कमर्शियल कॉलोनी दिगंबर जैन संत भवन में आचार्य पुलक सागरजी ने कहा कि करुणा हृदय का स्पंदन है, दिल की धड़कन है। हृदय के अभाव में मनुष्य मृत है। वीणा में संगीत उसके तारों से पैदा होता है और मनुष्य के अंदर संगीत करुणा के तारों से पैदा होता है। जिस जीवन के पास से ह्रदय खो जाता है वह जीवन क्षीण हो जाता है, फिर उसके पास जो भी सत्य है, जो भी श्रेष्ठ है जो भी उत्तम है वह सब मर जाता है। आचार्यजी ने कहा कि अगर आप चाहते हैं कि आपके जीवन में परमात्मा रुपी कोई संगीत पैदा हो और सत्यम शिवम सुंदरम जीवन में प्रविष्ट हो तो बिना करुणा के तारों को वापस संजोए और कोई रास्ता नहीं है।
मैं करुणा को प्रार्थना भी कहता हूं, करुणा को प्रभु प्राप्ति का मार्ग भी कहता हूं और करुणा को परमात्मा भी कहता हूं । करुणा के अभाव में प्रार्थना, पूजा, जप, तप, साधना सब झूठे हैं। करुणा के अभाव में परम परमात्मा का द्वार नहीं मिलता। करुणा के अभाव में मोह का ताला खुलता ही नहीं। करुणा मंत्र है ह्रदय की वीणा को संगीत पूर्ण बनाने का। अगर हम करुणा को भली-भांति जानते हैं तो जीवन में कुछ और जानना शेष नहीं रह जाता।
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