करीब 267 साल पहले चिकित्सा के संसाधन बहुत कम थे। लेकिन, महाराजा सूरजमल की सोच बड़ी थी। उन्होंने मुस्लिम आक्रांता अहमद शाह अब्दाली द्वारा ब्रज क्षेत्र में की गई मारकाट से फैली महामारी को चिकित्सीय कैंप और राहत शिविरों के जरिए बढ़ने से रोका। ऐसा उन्होंने दूसरी बार 1756 में भी किया।

जब पानीपत के युद्ध में मराठों को अब्दाली से हार का सामना करना पड़ा। इतिहासकार रामवीर सिंह वर्मा ने बताया कि बात सन 1753 की है। मुस्लिम आक्रांता अहमद शाह अब्दाली दिल्ली फतह के बाद ब्रज की ओर बढ़ा और तभी उसके वकीलों ने उकसाया कि जाट राजा सूरजमल काफी धनी है। उससे चौथ वसूली की जाए।

अब्दाली ने उस समय दो करोड़ रुपए की चौथ मांगी, अन्यथा जाट राज्य को तहस-नहस कर देने की धमकी दी। चूंकि महाराजा सूरजमल राजनीतिक और सामरिक रूप से दूरदर्शी थे। इसलिए उन्होंने अब्दाली को ब्रज में आने से रोकने के लिए दो तरफा रणनीति बनाई।

एक ओर चौथ देने का भरोसा दिया और दूसरी ओर अपने पुत्र राजकुमार जवाहर सिंह को मथुरा जिले के चौमुंहा किले पर तैनात किया। अब्दाली के बार-बार मांगने पर जब महाराजा सूरजमल ने चौथ नहीं पहुंचाई तो उसने सेना को भेजा। उसकी सेना का चौमुंहा में जाट सेना ने सामना किया।

तोप खाने से लैस अब्दाली की सेना से भरतपुर के सैनिकों ने जमकर युद्ध किया। इसमें करीब 19 हजार सैनिक खेत रहे। भरतपुर सैनिकों के प्रतिरोध से गुस्साए अब्दाली ने मथुरा, गोकुल, वृंदावन और बरसाने में भयंकर मारकाट मचाई। उस समय के लेखकों ने लिखा है कि ब्रज भूमि रक्तरंजित हो गई। यमुना का रंग लाल हो गया। यानी पचासियों हजार लोगों को मारा काटा गया।

महिलाओं से व्यभिचार हुए। लेकिन, तब गर्मियां आ चुकी थी और पर्शियन जीवन शैली के अब्दाली सैनिक गर्मी को झेल नहीं पाए और वापस लौट गए। महाराजा सूरजमल ने तत्काल ब्रज में सेवा कार्य शुरू कराए, ताकि शव और रक्त के कारण महामारी नहीं फैले।

मृतकों का सामूहिक दाह संस्कार कराया। अन्न और दवा जैसे सेवा कार्य शुरू किए। करीब दो सौ मील तक फैले अपने राज्य में यूनानी और आयुर्वेद के अधिकांश चिकित्सकों को बुलाकर सेवा कैंप लगाए। नतीजा यह रहा कि जल्द ही स्थितियां सामान्य हो गईं। ऐसे ही हालात 3 साल बाद 1756 में बने, जब मराठा सैनिक पानीपत युद्ध में अब्दाली से हार के बाद घायल होकर लौटे तो राज्यभर में मुनादी करवाकर सैनिकों की चिकित्सा, अन्न, वस्त्र से सहायता की। मृत सैनिकों की ससम्मान सामूहिक अंत्येष्टि कराई, जिससे महामारी को फैलने से रोका जा सके।

महारानी किशोरी ने संभाली कमान
मुस्लिम आक्रांता अहमद शाह अब्दाली द्वारा ब्रज में की गई मारकाट के कारण जब महामारी की स्थिति बनने लगी तो महारानी किशोरी ने चिकित्सा/राहत शिविर लगाने में सबसे अहम भूमिका निभाई। उन्होंने खुद आगे आकर कमान संभाली।

इतिहास की जानकार डॉ. सुधा सिंह ने बताया कि महारानी किशोरी ने मुनादी कराई और मथुरा जाकर पीड़ित परिवारों को सांत्वना देने के साथ ही उनकी सार संभाल भी की। महारानी की देखरेख के कारण चिकित्सीय और राहत कार्यों में तेजी आई। फलस्वरूप चिकित्सीय सुविधाएं थोड़ी होने के बाद भी महामारी को रोकने में सफलता मिली। ऐसे कार्यो के प्रति महारानी हमेशा अग्रणी रही। जब मुस्लिम आंक्राता के सामने राजा व सेना वहां युद्ध कौशल में लगी रहती थी। उसी समय महारानी आमजन की परेशानियों में ध्यान देती थी।



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Maharaja Surajmal prevented the epidemic by spreading medical and relief camps 267 years ago.
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