खेती में काम आने वाली ट्रैक्टर-ट्रॉलियां भरतपुर शहर और कस्बों में हादसों का कारण बन रही हैं। इसी साल इनसे 146 हादसे हुए हैं। इनमें 43 लोगों को जान गंवानी पड़ी है। जबकि 87 लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं। इन पर कार्रवाई इसलिए नहीं हो पाती क्योंकि 90 फीसदी ट्रैक्टर-ट्रॉलियों पर आगे या पीछे रजिस्ट्रेशन नंबर ही नहीं लिखा होता है।

वैसे नियम यह है कि इनका उपयोग केवल खेतीबाड़ी अथवा फसल को बेचने के लिए मंडी तक लाने और खाली बारदाना लेकर जाने में ही हो सकता है। लेकिन, हकीकत यह है कि ज्यादातर ट्रैक्टर-ट्रॉलियां भरतपुर शहर में ईंट, पत्थर, बजरी, रेता, सीमेंट, लोहे के गार्डर आदि निर्माण सामग्री ढोने का काम कर रही हैं।

परिवहन विभाग के आंकड़ों की मानें तो जिले में 28790 ट्रैक्टर रजिस्टर्ड हैं। लेकिन, इनमें से केवल 657 ने ही कामर्शियल वाहन के लाइसेंस ले रखे हैं। भास्कर संवाददाता ने एक सप्ताह तक शहर में ट्रैक्टर-ट्रॉलियों की गतिविधियों का जायजा लिया।

इस दौरान देखा कि शहर के सरकुलर रोड, कुम्हेर-डीग रोड, स्टेशन रोड, सेवर रोड और चिकसाना रोड पर ट्रैक्टर-ट्रॉलियों का आवागमन बहुत ज्यादा रहता है। सरकूलर रोड पर रोजाना करीब 150 ट्रैक्टर-ट्रॉलियां गैर कृषि सामान से लदी हुई खड़ी देखी जा सकती हैं। कई बार तो ऐसे नजारे भी दिखते हैं जब ओवरलोडिंग के कारण ट्रैक्टर के अगले दोनों पहिए जमीन से काफी ऊपर उठे होते हैं।

कम जगह में भी घुसा देते हैं ट्रैक्टर, इसलिए होती हैं दुर्घटनाएं
चूंकि ट्रैक्टर का अगला भाग संकरा होता है,जबकि ट्रॉली का हिस्सा ज्यादा चौड़ा होता है। कम जगह होते हुए भी ड्राइवर ट्रैक्टर-ट्रॉली को आगे बढ़ा देता हैं। इसलिए आसपास चलने वाले राहगीर और वाहन चालक ट्रॉली से घिस्सा लगकर चपेट में आ जाते हैं। जब तक चपेट में आया व्यक्ति संभलता है, तब तक ड्राइवर वाहन को स्पीड में भगा ले जाता है। वाहन के पीछे-आगे नंबर भी नहीं लिखे होते, इसलिए पीडित पुलिस में शिकायत भी नहीं कर पाते हैं।

20 की स्पीड लिमिट, फिर भी तेज दौड़ते हैं ट्रैक्टर-ट्रॉली
नगर निगम क्षेत्र में ट्रैक्टर-ट्रॉली की स्पीड 20 किलोमीटर प्रति घंटा तय है। लेकिन, यहां आमतौर पर 30 और 40 किमी प्रति घंटा की स्पीड से दौड़ती हैं। इससे दुर्घटनाएं ज्यादा हो रही हैं। क्योंकि तेज स्पीड में ट्रैक्टर-ट्रॉली को काबू करना मुश्किल होता है।

कार्रवाई करते ही नेताओं का आता है दबाव
यातायात पुलिस के मुताबिक वर्ष 2019 में 125, वर्ष 2018 में 104 और वर्ष 2017 में 91 दुर्घटनाएं ट्रैक्टर ट्रालियों से हुईं हैं। इधर, परिवहन विभाग और पुलिस के अधिकारियों का कहना है कि सरकार ने ट्रैक्टर-ट्रॉलियों पर ज्यादा कार्रवाई नहीं करने के लिए मौखिक आदेश दे रखे हैं। क्योंकि इन पर कार्रवाई होते ही उन्हें छोड़ने के लिए जन प्रतिनिधियों का दबाव आने लगता है।

रजिस्ट्रेशन नंबर जरूरी, फिर भी कार्रवाई नहीं
परिवहन विभाग के मुताबिक ट्रैक्टर-ट्रॉली पर आगे-पीछे रजिस्ट्रेशन नंबर अनिवार्य है। कोई ट्रैक्टर-ट्रॉली बिना नंबर मिलती है तो उसका चालान करने का प्रावधान है। इसमें उससे 5 हजार रुपए तक का जुर्माना वसूला जा सकता है।

राज्य सरकार का सॉफ्ट कॉर्नर, इसलिए इग्नोर करना पड़ता है : डीटीओ
^ट्रैक्टर-ट्रॉली मालिक आम तौर पर किसान होते हैं। इनके प्रति सरकार का सॉफ्ट कॉर्नर रहता है, इसलिए हमें भी इन्हें इग्नोर करना पड़ता है। फिर भी अभियान चलाकर ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करने वाले ट्रेक्टर-ट्रॉली चालकों के खिलाफ कार्यवाही की जाती है। अब फिर ट्रैक्टर-ट्रॉली चालकों को रजिस्ट्रेशन नंबर लिखवाने एवं कॉमर्शियल स्वीकृति लेने के लिए समझाइश की जाएगी।
-सत्य प्रकाश शर्मा, जिला परिवहन अधिकारी


कार्रवाई करते ही आने लगती हैं नेताओं की सिफारिशें : यातायात निरीक्षक
^यह सही है कि अधिकांश ट्रैक्टर-ट्रॉलियों पर रजिस्ट्रेशन नंबर भी नहीं लिखे होते। जब भी किसी ट्रैक्टर-ट्रॉली के खिलाफ कार्यवाही की जाती है तो नेताओं की सिफारिशें आने लगती हैं। उनकी बात नहीं मानें तो वे अधिकारियों को शिकायतें करते हैं।
-राममिलन मीना, यातायात निरीक्षक



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No tractor-trolleys killed 43 people in a year in the city
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