जेकेलाेन हाॅस्पिटल में अब बदलाव दिखने लगा है, लेकिन बस, हर किसी की एक ही ख्वाहिश है कि यह बदलाव स्थायी रहे। शनिवर काे अस्पताल के सभी एनआईसीयू में एक वार्मर पर एक ही बच्चा एडमिट था। आम तौर पर पूरे साल इस अस्पताल के एनआईसीयू में एक वार्मर पर दो से तीन बच्चे रहते हैं, क्योंकि वार्मर कम हैं और बच्चे ज्यादा होते हैं। लेकिन अचानक यह बदलाव कैसे हुआ, इसके पीछे एक आइडिया काम आया और अस्पताल प्रबंधन ने तत्काल इस पर काम भी शुरू कर दिया। असल में यह आइडिया उदयपुर आरएनटी मेडिकल काॅलेज के प्रिंसिपल व राज्य के वरिष्ठ शिशु राेग विशेषज्ञाें में शुमार डाॅ. लाखन पाेसवाल ने दिया, जिन्हें राज्य सरकार ने 15 दिन के लिए कोटा में लगाया हुआ है।
डाॅ. पाेसवाल ने एक कंसेप्ट दिया “रूमिंग इन’, जिसके तहत नवजात काे मां के पास रखकर वहीं बेहतर केयर दी जाती है। उसी के तहत शनिवार काे एनआईसीयू से बड़ी संख्या में उन बच्चाें काे अपनी मांओं के पास शिफ्ट किया गया, जाे स्टेबल थे और जिन्हें किसी तरह की एंटी बायाेटिक्स, ग्लूकाेज व ऑक्सीजन की रिक्वायरमेंट नहीं थी। इन बच्चाें काे निकालते ही एनअाईसीयू में जगह खाली हाे गई और शनिवार शाम काे स्थिति यह थी कि कुछ वार्मर खाली थे, ताकि इमरजेंसी में काेई नवजात लाया जाए ताे उसे तत्काल वार्मर पर लिया जा सके।

अब एनआईसीयू में एक वार्मर पर एक ही बच्चा रखा जाएगा

डाॅ. लाखन पाेसवाल ने भास्कर काे बताया कि इस अस्पताल में सबसे बड़ा चैलेंज ही ओवरक्राउड है। वर्तमान में एनआईसीयू के 54 बेड हैं, जबकि बच्चे हमेशा ज्यादा हाेते हैं। रूमिंग इन उस कंसेप्ट के तहत शनिवार काे मीटिंग हुई और प्रिंसिपल डाॅ. विजय सरदाना, अधीक्षक डाॅ. अशाेक मूंदड़ा व एचओडी डाॅ. अमृता मयंगर समेत पूरी टीम के साथ विस्तार से चर्चा की गई।

उनके निर्देशन में गायनी विभाग में दाे ऐसे वार्ड चिह्नित किए गए, जहां उन्हीं मांओं काे रखा जाए, जिनके साथ बच्चा है। इनमें दूसरी काेई महिला एडमिट नहीं हाेगी। इन वार्डाें में कार्यरत नर्सिंग स्टाफ काे अब पीडियाट्रिक्स के लिहाज से अलग से ट्रेंड किया जाएगा और यहां पीडियाट्रिक्स विभाग के डाॅक्टर उसी तरह राउंड लेंगे, जिस तरह बच्चा वार्ड में राउंड लेते हैं।

इससे दाे फायदे हाेंगे, एक ताे एनआईसीयू में वे ही बच्चे रहेंगे, जिन्हें रिक्वायरमेंट है। साथ ही मां के साथ रहने से बच्चे काे कंगारू मदर केयर (मां की छाती से बच्चे को चिपकाकर रखना) मिल पाएगी, जिससे वह जल्दी रिकवर हाेगा। यहां मां के साथ उनके परिवार की एक वरिष्ठ महिला काे रहने की अनुमति रहेगी, ताकि वे ब्रेस्ट फीडिंग समेत अन्य जरूरताें के हिसाब से जच्चा की उचित देखभाल कर पाए।

बीते 10 दिन में जेकेलाेन में क्या-क्या बदला, बता रहे हैं प्रिंसिपल डाॅ. विजय सरदाना

  • 47 नए नर्सिंगकर्मी लगाए जा चुके हैं, 17 नए डाॅक्टर लगाए हैं। डाॅक्टराें में दाे सीनियर प्राेफेसर भी हैं, जिनमें से एक ने ज्वाॅइन कर लिया।
  • 10 वेंटीलेटर, 1 एबीजी मशीन व 20 मल्टी पैरा माॅनिटर लगाए जा रहे हैं, 20 बेड का अस्थायी एनआईसीयू बनाया जा रहा है।
  • 40 बेड के नए एनआईसीयू व पुराने एनआईसीयू व वार्डाें के रिनाेवेशन के लिए 8 कराेड़ के प्रस्ताव तैयार किए गए हैं।
  • पहले एक नर्सिंग अधीक्षक हाेता था, अब दाे नए नर्सिंग अधीक्षक लगाए गए हैं, ताकि माॅनीटरिंग बेहतर हाे।
  • अधीक्षक, एचओडी व नर्सिंग अधीक्षक बदल दिए गए हैं।
  • 3 असिस्टेंट प्राेफेसर और लिए जा रहे हैं, जिनके लिए शनिवार काे इंटरव्यू हाे चुके हैं।
  • 12 बेड का नया एनआईसीयू शुरू किया गया है।

स्कूल ऑफ नर्सिंग का पुराना भवन देखा

जेकेलाेन अस्पताल में फर्स्ट फ्लाेर पर संचालित बच्चा वार्ड में अब एनआईसीयू शुरू किया जा रहा है, जहां 20 वार्मर लगेंगे। ऐसे में नए वार्ड बनने तक अस्थायी रूप से जरूरत पड़ने पर बच्चा वार्ड जेकेलाेन के पीछे बने स्कूल ऑफ नर्सिंग के पुराने भवन में चलाए जा सकेंगे। इसका शनिवार काे प्रिंसिपल डाॅ. सरदाना व अन्य डाॅक्टराें ने दाैरा भी किया, यहां करीब 45 बेड लगाने की गुंजाइश है।



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नई व्यवस्था के बाद सुधरे हालात।
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