(संदीप शर्मा). कोरोना संक्रमितों को रेमडेसिविर इंजेक्शन लगाने चाहिए या नहीं? क्या यह वाकई मरीजों की जान बचाने में कारगर है? इसके साइट इफेक्ट्स हैं क्या, हैं तो कितने खतरनाक? ये ऐेसे सवाल हैं जो आम जनमानस के साथ चिकित्सा क्षेत्र के दिग्गजों के बीच बड़ी बहस बने हुए हैं। अब तो जो जवाब इन बहस से निकले हैं, उनके मुताबिक- रेमडेसिविर इंंजेक्शन लगाने का वास्तव में कोई फायदा ही नहीं है। जल्दी रिकवरी के लिए यह इंजेक्शन कारगर है, लेकिन साइड इफेक्ट्स ज्यादा हैं।
कोरोना संक्रमितों को भले ही रेमडेसिविर लगाए जा रहे हों, लेकिन डॉक्टर्स खुद कह रहे हैं- जान बचाने के लिए यह इंजेक्शन बिल्कुल असरकारक नहीं है। यदि ऐसा होता तो अमेरिका और यूरोप में इतनी अधिक जानें नहीं जातीं। रेमडेसिविर लगाया जाना चाहिए या नहीं? इस पर ना तो डॉक्टर एकमत हैं और ना ही नेशनल लेवल पर गाइडलाइन बनी है।
डब्ल्यूएचओ और आईसीएमआर ने भी 11,000 लोगों पर ट्रायल के बाद कहा- रेमडेसिविर लगाने का फायदा नहीं है। इसके साइड इफेक्ट्स काफी अधिक हैं। ट्रायल के बाद स्पष्ट यह भी कि हुआ किसी भी गंभीर मरीज को बचाया नहीं जा सका लेकिन जो लोग 15 दिन में रिकवर हो रहे थे, वे 10 दिन तक में हो गए। यह इंजेक्शन जल्द रिकवरी के लिए ही लगाया जा रहा है। चौंकाने वाली बात है कि सबसे अधिक इंजेक्शन जयपुर में लगे और मौतों का आंकड़ा भी यहीं अधिक है। हालांकि विभाग और सरकार जयपुर में अधिक मरीज होने की बात कहते हैं।
रेमडेसिविर के लिए गाइडलाइन नहीं, डॉक्टर अपने स्तर पर दे रहे इंजेक्शन
अभी प्रदेश में डॉक्टर अपने स्तर पर रेमडेसिविर इंजेक्शन लगा रहे हैं। राजस्थान में लगभग हर तीसरे पॉजिटिव को यह इंजेक्शन लगाया जा रहा है। रेमडेसिविर इंजेक्शन कोविड पेशेंट के लगाने के साथ ही नॉन कोविड मरीजों के भी लगाया जा रहा है। डॉक्टर कहते हैं- कई सीनियर डॉक्टरों ने उन्हें इसका अच्छा रेस्पांस बताया, इसलिए वे ऐसा कर रहे हैं।
एचआर सीटी स्कोर देखकर ही यह इंजेक्शन लगा रहे हैं। रेमडेसिविर के बारे में इतनी अनिश्चितताएं हैं कि डब्ल्यूएचएओ ने भी कहा है कि इसका ट्रायल जारी रखा जाए। यानी जो कॉम्बिनेशन हैं, उनमें कुछ ना कुछ बदलाव किए जा रहे हैं और लगातार ट्रायल जारी हैं। आगामी ट्रायल के बाद ही कुछ तय हो पाएगा और फिर कह पाने की स्थिति होगी।
प्रदेश के 3 बड़े अस्पतालों में 90% संक्रमितों का रेमडेसिविर ही बना है इलाज
- अजमेर जेएलएन मेडिकल कॉलेज में कोविड के 125 मरीज भर्ती हैं। 35 पॉजिटिव 28 सस्पेक्ट हैं। 84 पुरुष और 40 महिलाएं हैं। रेमडेसिविर सभी को लग रहा है। मेडिसिन विभाग के आचार्य डॉ अनिल सामरिया बताते हैं- पॉजिटिव मरीजों के अनिवार्य रूप से लगा रहे हैं। नेगेटिव में जिनका सीटी स्कोर सही नहीं उसे लगा रहे हैं। संक्रमित में लिवर फैल्योर या यूरियन कैटरीन बढ़ा है तो उन्हें नहीं लगा रहे हैं।
- जयपुर आरयूएचएस राजधानी का डेडिकेटेड कोविड हॉस्पिटल है। यहां भी 90 फीसदी मरीजों को रेमडेसिविर इंजेक्शन लगाया जा रहा है। अभी इस हॉस्पिलट में 600 से अधिक मरीज भर्ती हैं। प्रदेश में सबसे अधिक रेमडेसिविर इंजेक्शन यहीं लगाए जा रहे हैं। किस आधार पर इंजेक्शन लगाए जा रहे हैं? यह ना तो कोविड इंचार्ज डॉ. अजीत सिंह ने बताया, ना ही अन्य डॉक्टरों ने।
- जोधपुर एसएन मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन एचओडी डॉ. श्याम माथुर ने बताया कि कोरोना संक्रमितों को रेमेडेसिविर इंजेक्शन+ डेक्ससोना+ एलएमडब्लूएच का कॉम्बिनेशन डोज दे रहे हैं। केवल रेमेडसिविर नहीं दे रहे हैं। जिनको केवल रेमडेसिविर इंजेक्शन दिया उनमें उतना फायदा देखने को नहीं मिला है। जो मेडिकल प्रोटोकॉल तय किए गए हैं, हम उसके अनुसार ही इलाज दे रहे हैं।
10 दिन बाद अनुपयोगी: पल्मोनॉलिस्ट डॉ. एमके गुप्ता बताते हैं- संक्रमण के 10 दिन बाद यह इंजेक्शन लगाया जाता है तो अनुपयोगी है। चाहे एचआरसीटी में कोई भी स्कोर आ रहा हो। दूसरी ओर एसएमएस के ही एक डॉक्टर इसे हर तरह से उपयोगी बता रहे हैं। सभी मेडिकल कॉलेजों से होने वाली वीडियो कांफ्रेसिंग में भी ये डॉक्टर रेमेडिसिविर को काम में लेने की कह चुके हैं।
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